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Subhan Asad
yahii talab hai jo jeena sikhaaye jaati hai
yahii talab hai jo jeena sikhaaye jaati hai | यही तलब है जो जीना सिखाए जाती है
- Subhan Asad
यही
तलब
है
जो
जीना
सिखाए
जाती
है
तुम्हारे
ख़्वाब
न
देखें
तो
कब
के
मर
जाएँ
- Subhan Asad
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तलब
करें
तो
ये
आँखें
भी
इन
को
दे
दूँ
मैं
मगर
ये
लोग
इन
आँखों
के
ख़्वाब
माँगते
हैं
Abbas rizvi
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मेरे
हाथों
में
कुछ
गुलाब
तो
हैं
जो
न
मुमकिन
रहे
वो
ख़्वाब
तो
हैं
Shaista mufti
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सुनहरी
लड़कियों
इनको
मिलो
मिलो
न
मिलो
ग़रीब
होते
हैं
बस
ख़्वाब
देखने
के
लिए
Abbas Tabish
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न
सिर्फ़
ये
कि
जहन्नुम
ख़िताब
में
भी
नहीं
अली
के
मानने
वालों
के
ख़्वाब
में
भी
नहीं
Muzdum Khan
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नए
दौर
के
नए
ख़्वाब
हैं
नए
मौसमों
के
गुलाब
हैं
ये
मोहब्बतों
के
चराग़
हैं
इन्हें
नफ़रतों
की
हवा
न
दे
Bashir Badr
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जब
भी
कश्ती
मिरी
सैलाब
में
आ
जाती
है
माँ
दु'आ
करती
हुई
ख़्वाब
में
आ
जाती
है
Munawwar Rana
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ख़मोशी
मेरी
मअनी-ख़ेज़
थी
ऐ
आरज़ू
कितनी
कि
जिस
ने
जैसा
चाहा
वैसा
अफ़्साना
बना
डाला
Arzoo Lakhnavi
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तसव्वुर
में
भी
अब
वो
बे-नक़ाब
आते
नहीं
मुझ
तक
क़यामत
आ
चुकी
है
लोग
कहते
हैं
शबाब
आया
Hafeez Jalandhari
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गुलाब
ख़्वाब
दवा
ज़हर
जाम
क्या
क्या
है
मैं
आ
गया
हूँ
बता
इंतिज़ाम
क्या
क्या
है
Rahat Indori
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ये
आरज़ू
भी
बड़ी
चीज़
है
मगर
हमदम
विसाल-ए-यार
फ़क़त
आरज़ू
की
बात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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और
किस
शय
से
दाग़-ए-दिल
धोएँ
क्या
करें
गर
न
इस
क़दर
रोएँ
दिल
तो
पत्थर
बना
दिया
तू
ने
आरज़ू
किस
ज़मीन
में
बोएँ
हम
किसी
बात
से
नहीं
डरते
हम
ने
पाया
ही
क्या
है
जो
खोएँ
आज
फ़ुर्सत
मिली
हैं
मुद्दत
बअ'द
आओ!
तंगी-ए-वक़्त
पर
रोएँ
हम
यही
ख़्वाब
देखते
हैं
'असद'
उन
के
शाने
पे
रख
के
सर
सोएँ
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Subhan Asad
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तू
इस
तरह
से
मिला
फिर
मलाल
भी
न
रहा
तेरे
ख़याल
में
अपना
ख़याल
भी
न
रहा
कुछ
इस
अदास
झुकी
थी
हया
से
आँख
तेरी
हमारी
आँख
में
कोई
सवाल
भी
न
रहा
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Subhan Asad
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मेरी
नींदें
उड़ा
रक्खी
है
तुम
ने
ये
कैसे
ख़्वाब
दिखलाती
हो
जानाँ
किसी
दिन
देखना
मर
जाऊँगा
मैं
मेरी
क़स
में
बहुत
खाती
हो
जानाँ
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Subhan Asad
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अबके
चेहरे
पे
वो
दरार
आई
आईना
बन
गया
तमाशाई
अपना
दिल
जैसे
दुखती
आँख
कोई
उसकी
यादें
कि
जैसे
पुरवाई
एक
मुद्दत
के
बाद
हमने
'असद'
उसको
देखा
तो
अपनी
याद
आई
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Subhan Asad
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मैं
जानता
हूँ
तेरी
रूह
की
तलब
जानाँ
तुझे
बदन
की
तरफ़
से
नहीं
छूउँगा
मैं
Subhan Asad
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