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Sohil Barelvi
kyun nahin aa.e ye mire sar men
kyun nahin aa.e ye mire sar men | क्यूँँ नहीं आए ये मेरे सर में
- Sohil Barelvi
क्यूँँ
नहीं
आए
ये
मेरे
सर
में
ज़ख़्म
भरते
नहीं
दिसंबर
में
ग़ौर
से
देख
लूटने
वाले
और
कुछ
तो
नहीं
बचा
घर
में
वक़्त-ए-आख़िर
लगा
दिया
मैंने
ज़ोर
जितना
भी
था
मिरे
पर
में
इक
तो
दुनिया
ख़िलाफ़
है
मेरे
और
तू
भी
नहीं
मुक़द्दर
में
क्या
पता
कब
इधर
ख़िज़ाँ
आई
मैं
तो
खोया
रहा
गुल-ए-तर
में
जिस्म
बाहर
पड़ा
रहा
और
मैं
डूब
कर
मर
गया
समुंदर
में
तैश
में
आ
गए
मियाँ
'सोहिल'
और
फिर
कुछ
नहीं
बचा
घर
में
- Sohil Barelvi
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घर
से
निकले
हुए
बेटों
का
मुक़द्दर
मालूम
माँ
के
क़दमों
में
भी
जन्नत
नहीं
मिलने
वाली
Iftikhar Arif
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किताब-ए-मुक़द्दर
में
रांझा
दिवाना
मगर
हीर
बेहद
सयानी
लिखी
थी
Amaan Pathan
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नया
लिबास
भी
पहनो
तो
इस
तरह
पहनो
जिन्हें
नसीब
नहीं
है
उन्हें
नया
न
लगे
Javed Saba
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न
हुआ
नसीब
क़रार-ए-जाँ
हवस-ए-क़रार
भी
अब
नहीं
तिरा
इंतिज़ार
बहुत
किया
तिरा
इंतिज़ार
भी
अब
नहीं
तुझे
क्या
ख़बर
मह-ओ-साल
ने
हमें
कैसे
ज़ख़्म
दिए
यहाँ
तिरी
यादगार
थी
इक
ख़लिश
तिरी
यादगार
भी
अब
नहीं
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Jaun Elia
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कभी
पत्थर
मुक़द्दर
लिख
नहीं
सकता
मगर
समझो
जिसे
पत्थर
में
ढूँढो
हो
तुम्हारे
पास
ही
तो
है
Tanha
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ये
ज़ुल्फ़
अगर
खुल
के
बिखर
जाए
तो
अच्छा
इस
रात
की
तक़दीर
सँवर
जाए
तो
अच्छा
जिस
तरह
से
थोड़ी
सी
तेरे
साथ
कटी
है
बाक़ी
भी
उसी
तरह
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
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Sahir Ludhianvi
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मेरी
तक़दीर
में
जलना
है
तो
जल
जाऊँगा
तेरा
वा'दा
तो
नहीं
हूँ
जो
बदल
जाऊँगा
Sahir Ludhianvi
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फिर
एक
रोज़
मुक़द्दर
से
हार
मानी
गई
ज़बीन
चूम
के
बोला
गया
"ख़ुदा
हाफ़िज़"
Afkar Alvi
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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जो
मिल
गया
उसी
को
मुक़द्दर
समझ
लिया
जो
खो
गया
मैं
उस
को
भुलाता
चला
गया
Sahir Ludhianvi
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कोई
झगड़ा
अब
न
होगा
यार
से
प्यार
की
बातें
करेंगे
प्यार
से
मुश्किलों
से
मुश्किलों
को
हल
किया
ख़ार
को
मैं
ने
निकाला
ख़ार
से
आज़माती
हैं
कभी
तो
कश्तियाँ
पार
सब
होते
नहीं
पतवार
से
अपनी
धुन
में
इक
परिंदा
कह
गया
ला
दे
इक
जंगल
मुझे
बाज़ार
से
आज
फिर
कुछ
लोग
मुझ
को
याद
आए
आज
फिर
कुछ
लोग
बोले
प्यार
से
कोई
तो
होगा
हमारा
फ़िक्र-मंद
कोई
तो
आवाज़
दे
उस
पार
से
चंद
साँसों
के
सहारे
है
मगर
कौन
मिलने
आ
रहा
बीमार
से
सामने
से
अनसुना
कोई
करे
कोई
सुनता
है
पस-ए-दीवार
से
कौन
अपना
या
पराया
कौन
है
सब
नज़र
आने
लगे
आसार
से
अब
हमारी
क्या
सुनोगे
जब
तुम्हें
बात
करनी
है
किसी
अग़्यार
से
सब्र
से
कुछ
काम
लो
सोहिल
मियाँ
और
भी
आने
हैं
दिन
दुश्वार
से
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Sohil Barelvi
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यार
देखो
दुनिया
कितनी
ख़ूब-सूरत
है
यहीं
क्या
ख़्वाहिशों
का
बोझ
ढोते
ढोते
सब
को
मरना
होगा
Sohil Barelvi
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फ़लक
भी
सर-निगूँ
तकने
लगा
है
हम
अपने
पाँव
पर
चलने
लगे
हैं
Sohil Barelvi
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ख़ून
आँखों
में
सूख
जाता
है
तब
ग़ज़ल
पर
शबाब
आता
है
इश्क़
धागा
है
एक
ऐसा
जो
ज़ोर
देने
पे
टूट
जाता
है
जब
से
देखा
है
एक
तितली
को
मुझ
को
हर
एक
रंग
भाता
है
दिल
है
इक
ऐसा
उज़्व
जो
सोहिल
टूटे
तब
ही
क़रार
आता
है
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Sohil Barelvi
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रहनुमाओं
हाथ
मेरा
था
में
रहना
आप
सब
के
साथ
चलना
चाहता
हूँ
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Sohil Barelvi
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