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Siraj Faisal Khan
use paane ki karte ho dua to
use paane ki karte ho dua to | उसे पाने की करते हो दु'आ तो
- Siraj Faisal Khan
उसे
पाने
की
करते
हो
दु'आ
तो
मगर
उस
से
भी
कल
जी
भर
गया
तो
यक़ीनन
आज
हम
इक
साथ
होते
अगर
करते
ज़रा
सा
हौसला
तो
चले
हो
रहनुमा
कर
इल्म
को
तुम
तुम्हें
इस
इल्म
ने
भटका
दिया
तो
समझ
सकते
हो
क्या
अंजाम
होगा
तुम्हारे
वार
से
वो
बच
गया
तो
बहुत
मसरूफ़
था
महफ़िल
में
माना
नहीं
कुछ
बोलता
पर
देखता
तो
किसी
को
चाहती
है
पूछ
लूँ
क्या
जवाब
इस
का
मगर
हाँ
में
मिला
तो
मैं
अच्छा
हूँ
तभी
अपना
रही
हो
कोई
मुझ
से
भी
अच्छा
मिल
गया
तो
बहुत
नज़दीक
मत
आया
करो
तुम
कहीं
कुछ
हो
गई
हम
से
ख़ता
तो
बहुत
से
काम
कल
करने
हैं
मुझ
को
मगर
ऐ
ज़िंदगी
कल
न
हुआ
तो
ग़ुलामी
में
जकड़
लेगा
कोई
फिर
वतन
ऐसे
ही
गर
लुटता
रहा
तो
उसे
फिर
कौन
मारेगा
बताओ
ग़म-ए-हिज्राँ
ने
भी
ठुकरा
दिया
तो
- Siraj Faisal Khan
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अदब
ता'लीम
का
जौहर
है
ज़ेवर
है
जवानी
का
वही
शागिर्द
हैं
जो
ख़िदमत-ए-उस्ताद
करते
हैं
Chakbast Brij Narayan
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मुझे
अँधेरे
से
बात
करनी
है
सो
करा
दो,
दिया
बुझा
दो
कुछ
एक
लम्हों
को
रौशनी
का
गला
दबा
दो,
दिया
बुझा
दो
रिवाज़-ए-महफ़िल
निभा
रहा
हूँ
बता
रहा
हूँ
मैं
जा
रहा
हूँ
मुझे
विदा
दो,
जो
रोना
चाहे
उन्हें
बुला
दो,
दिया
बुझा
दो
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Vikram Gaur Vairagi
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महफ़िल
में
तेरी
यूँँ
ही
रहे
जश्न-ए-चरागाँ
आँखों
में
ही
ये
रात
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
Sahir Ludhianvi
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शुमार
अपना
भी
हो
जाए
अदब
के
नाम
चीनों
में
ख़ुदा
कुछ
शे'र
कहला
दे
अगर
मुश्किल
ज़मीनों
में
मैं
फ़न्न-ए-शा'इरी
पर
इसलिए
क़ुर्बान
हूँ
रहबर
नहीं
मिलता
ये
गौहर
बादशाहों
के
ख़ज़ीनों
में
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Moid Rahbar
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मुझ
सेे
होकर
के
ही
बे-ज़ार
चले
जाते
हैं
मेरी
महफ़िल
से
मेरे
यार
चले
जाते
हैं
मुझको
मालूम
है
रहता
नहीं
है
अब
वो
वहाँँ
साल
में
फिर
भी
हम
इक
बार
चले
जाते
हैं
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Dipendra Singh 'Raaz'
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ज़ख़्म
उनके
लिए
मेहमान
हुआ
करते
हैं
मुफ़लिसी
जो
तेरे
दरबान
हुआ
करते
हैं
वो
अमीरों
के
लिए
आम
सी
बातें
होंगी
हम
ग़रीबों
के
जो
अरमान
हुआ
करते
हैं
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Mujtaba Shahroz
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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बात
करनी
मुझे
मुश्किल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
जैसी
अब
है
तेरी
महफ़िल
कभी
ऐसी
तो
न
थी
Bahadur Shah Zafar
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तुम्हें
हम
भी
सताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
तुम्हारा
दिल
दुखाने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
हमें
बदनाम
करते
फिर
रहे
हो
अपनी
महफ़िल
में
अगर
हम
सच
बताने
पर
उतर
आएँ
तो
क्या
होगा
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Santosh S Singh
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ये
गूँगों
की
महफ़िल
है
निकलना
ही
पड़ेगा
क्या
इतनी
ख़ता
कम
है
कि
हम
बोल
पड़े
हैं
Waseem Barelvi
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चलो
ये
माना
मना
लोगी
ख़ानदान
को
तुम
मगर
बताओ
न
माने
अगर
वो
फिर
जानाँ?
Siraj Faisal Khan
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फ़ातिहा
पढ़
कि
फूल
रख
मुझ
पर
आ
गया
है
तो
कुछ
जता
अफ़सोस
Siraj Faisal Khan
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किताबों
से
निकल
कर
तितलियाँ
ग़ज़लें
सुनाती
हैं
टिफ़िन
रखती
है
मेरी
माँ
तो
बस्ता
मुस्कुराता
है
Siraj Faisal Khan
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मैं
इस
ख़याल
से
शर्मिंदगी
में
डूब
गया
कि
मेरे
होते
हुए
वो
नदी
में
डूब
गया
Siraj Faisal Khan
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तुम्हारा
हाथ
मेरे
हाथ
से
न
छूटेगा
न
ख़ानदां
से
डरूँगा
न
मैं
ज़माने
से
Siraj Faisal Khan
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