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Shubham Dwivedi
kabhi hansta hooñ to aankhe kabhi main nam bhi rakhta hooñ
kabhi hansta hooñ to aankhe kabhi main nam bhi rakhta hooñ | कभी हँसता हूँ तो आँखें कभी मैं नम भी रखता हूँ
- Shubham Dwivedi
कभी
हँसता
हूँ
तो
आँखें
कभी
मैं
नम
भी
रखता
हूँ
हर
इक
मुस्कान
के
पीछे
हज़ारों
ग़म
भी
रखता
हूँ
शिफ़ा
भी
दे
नहीं
सकता
मुझे
कोई
मेरा
अपना
नतीजन
मैं
मिरे
ज़ख़्मों
का
ख़ुद
मरहम
भी
रखता
हूँ
- Shubham Dwivedi
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इक
शख़्स
मेरे
घर
पे
नमाज़ों
में
है
लगा
जो
चाहता
है
देखना
अच्छाइयों
के
दिन
Aqib khan
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मुँह
ज़र्द-ओ-आह-ए-सर्द
ओ
लब-ए-ख़ुश्क
ओ
चश्म-ए-तर
सच्ची
जो
दिल-लगी
है
तो
क्या
क्या
गवाह
है
Nazeer Akbarabadi
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अब
ज़रूरी
तो
नहीं
है
कि
वो
सब
कुछ
कह
दे
दिल
में
जो
कुछ
भी
हो
आँखों
से
नज़र
आता
है
मैं
उस
सेे
सिर्फ़
ये
कहता
हूँ
कि
घर
जाना
है
और
वो
मारने
मरने
पे
उतर
आता
है
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Tehzeeb Hafi
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भीगी
पलकें
देख
कर
तू
क्यूँँ
रुका
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
तो
मेरी
आँख
में
कुछ
आ
गया
है
ख़ुश
हूँ
मैं
वो
किसी
के
साथ
ख़ुश
था
कितने
दुख
की
बात
थी
अब
मेरे
पहलू
में
आकर
रो
रहा
है
ख़ुश
हूँ
मैं
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Zubair Ali Tabish
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वक़्त,
वफ़ा,
हक़,
आँसू,
शिकवे
जाने
क्या
क्या
माँग
रहे
थे
एक
सहूलत
के
रिश्ते
से
हम
ही
ज़्यादा
माँग
रहे
थे
उसकी
आँखें
उसकी
बातें
उसके
लब
वो
चेहरा
उसका
हम
उसकी
हर
एक
अदास
अपना
हिस्सा
माँग
रहे
थे
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Shikha Pachouly
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फिर
नज़र
में
फूल
महके
दिल
में
फिर
शमएँ
जलीं
फिर
तसव्वुर
ने
लिया
उस
बज़्म
में
जाने
का
नाम
Faiz Ahmad Faiz
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ये
भी
मुमकिन
है
मियाँ
आँख
भिगोने
लग
जाऊँ
वो
कहे
कैसे
हो
तुम
और
मैं
रोने
लग
जाऊँ
ऐ
मेरी
आँख
में
ठहराए
हुए
वस्ल
के
ख़्वाब
मैं
तवातुर
से
तेरे
साथ
न
सोने
लग
जाऊँ
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Ejaz Tawakkal Khan
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जब
मिली
आँख
होश
खो
बैठे
कितने
हाज़िर
जवाब
हैं
हम
लोग
Jigar Moradabadi
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पुतलियाँ
तक
भी
तो
फिर
जाती
हैं
देखो
दम-ए-नज़अ
वक़्त
पड़ता
है
तो
सब
आँख
चुरा
जाते
हैं
Ameer Minai
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मंज़िलों
का
कौन
जाने
रहगुज़र
अच्छी
नहीं
उसकी
आँखें
ख़ूब-सूरत
है
नज़र
अच्छी
नहीं
Abrar Kashif
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लफ़्ज़
सारे
धरे
के
धरे
ही
रहे
वो
खड़े
थे
खड़े
के
खड़े
ही
रहे
उनके
मरहम
में
वो
बात
थी
ही
नहीं
ज़ख़्म
मेरे
हरे
के
हरे
ही
रहे
चैन
की
साँस
लेने
की
फ़ुर्सत
न
थी
आशिक़ी
में
मेरे
हादसे
ही
रहे
मैंने
सोचा
था
है
इल्म
थोड़ा
मगर
शा'इरी
में
मेरे
मस'अले
ही
रहे
लोग
आते
रहे
फूल
चुनते
रहे
ऐ
'शुभम'
तुम
भले
के
भले
ही
रहे
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Shubham Dwivedi
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बिन
बादल
बरसात
आई
है,आने
दो,
उसके
घर
बारात
आई
है,
आने
दो
Shubham Dwivedi
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यही
अब
आग
का
दरिया
है
मंज़िल
आख़िरी
मेरी,
गले
तक
जिस्म
डूबा
है
फ़क़त
अब
सर
ही
बाकी
है
Shubham Dwivedi
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बिन
बादल
बरसात
आई
है,आने
दो,
उसके
घर
बारात
आई
है,
आने
दो
Shubham Dwivedi
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हम
सफ़र
में
थे
पर,हम
सेफ़र
के
बिना,
वो
सफ़र
फिर
हमें
रास
आया
नहीं
Shubham Dwivedi
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