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Shivang Tiwari
saath ab mere kya nahin hota
saath ab mere kya nahin hota | साथ अब मेरे क्या नहीं होता
- Shivang Tiwari
साथ
अब
मेरे
क्या
नहीं
होता
जिस्म
बस
ये
फ़ना
नहीं
होता
रात
को
उठ
के
बैठ
जाते
हैं
दर्द
दिल
से
जुदा
नहीं
होता
क्या
गुज़रती
है
जान
पर
मेरी
ये
किसी
को
पता
नहीं
होता
जिसका
होना
था
हो
गया
हूँ
मैं
इश्क़
हर
मर्तबा
नहीं
होता
हाए
हालात
बन
गए
ऐसे
यूँँ
कोई
बे-वफ़ा
नहीं
होता
एक
मुद्दत
के
बाद
आए
हो
कोई
इतना
ख़फ़ा
नहीं
होता
कबके
दरिया
में
खो
गए
होते
साथ
जो
नाखु़दा
नहीं
होता
तुम
न
होते
क़रीब
गर
मेरे
मोज़िजा
ये
ख़ुदा
नहीं
होता
- Shivang Tiwari
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बीच
भँवर
से
कश्ती
कैसे
बच
निकली
बहुत
दिनों
तक
दरिया
भी
हैरान
रहा
Madan Mohan Danish
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हमने
तुझ
पे
छोड़
दिया
है
कश्ती,
दरिया,
भँवर,
किनारा
Siddharth Saaz
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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चाँद
चेहरा
ज़ुल्फ़
दरिया
बात
ख़ुशबू
दिल
चमन
इक
तुम्हें
दे
कर
ख़ुदा
ने
दे
दिया
क्या
क्या
मुझे
Bashir Badr
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मंज़र
बना
हुआ
हूँ
नज़ारे
के
साथ
मैं
कितनी
नज़र
मिलाऊँ
सितारे
के
साथ
मैं
दरिया
से
एक
घूँट
उठाने
के
वास्ते
भागा
हूँ
कितनी
दूर
किनारे
के
साथ
मैं
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Khalid Sajjad
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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हमारा
काम
तो
मौसम
का
ध्यान
करना
है
और
उस
के
बाद
के
सब
काम
शश-जहात
के
हैं
Pallav Mishra
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हो
गई
है
पीर
पर्वत
सी
पिघलनी
चाहिए
इस
हिमालय
से
कोई
गंगा
निकलनी
चाहिए
Dushyant Kumar
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धूप
के
एक
ही
मौसम
ने
जिन्हें
तोड़
दिया
इतने
नाज़ुक
भी
ये
रिश्ते
न
बनाये
होते
Waseem Barelvi
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शब
बसर
करनी
है,
महफ़ूज़
ठिकाना
है
कोई
कोई
जंगल
है
यहाँ
पास
में
?
सहरा
है
कोई
?
Umair Najmi
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ख़्वाब
को
साथ
मिलकर
सजाने
लगे
घर
कहीं
इस
तरह
हम
बसाने
लगे
कर
दिया
है
ख़फ़ा
इस
तरह
से
हमें
मान
हम
थे
गए
फिर
मनाने
लगे
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Shivang Tiwari
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अजब
सा
एक
रिश्ता
चाँद
का
अंबर
के
तारों
से
कि
बाग़ों
का
मिलन
हो
जैसे
सावन
में
बहारों
से
जहाँ
में
हाँ
ज़ुबाँ
कोई
मुहब्बत
की
नहीं
होती
बयाँ
जज़्बात
हो
जाते
हैं
आँखों
के
इशारों
से
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Shivang Tiwari
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बाग़
में
फिर
नज़र
आई
तितली
मुझ
को
फिर
बाग़
में
लाई
तितली
आज
की
शब
इसे
रख
ने
दो
बस
छोड़
ही
दूँगा
कल
भाई
तितली
बैठी
है
शाख
पर
एक
तितली
लग
रही
कितनी
ही
छाई
तितली
कौन
है
चाहने
वाला
तुम
को
बैठी
हो
बन
के
आराई
तितली
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Shivang Tiwari
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मुझे
तू
याद
करती
है
मगर
हिचकी
नहीं
आती
कभी
काग़ज़
के
फूलों
पर
कोई
तितली
नहीं
आती
ख़यालों
में
गुज़रता
हूँ
गली
से
रोज़
मैं,
लेकिन
मेरे
हिस्से
में
अब
तेरी
खुली
खिड़की
नहीं
आती
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Shivang Tiwari
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अब
मेरी
भी
ऐसी
हो
क़िस्मत
ज़रूरी
तो
नहीं
हुस्न
की
मुझको
मिले
उल्फ़त
ज़रूरी
तो
नहीं
गर
जहन्नुम
ही
रही
है
ज़िन्दगी
सारी
मेरी
बाद
मरने
के
मिले
जन्नत
ज़रूरी
तो
नहीं
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Shivang Tiwari
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