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Shivang Tiwari
baagh men phir nazar aayi titli
baagh men phir nazar aayi titli | बाग़ में फिर नज़र आई तितली
- Shivang Tiwari
बाग़
में
फिर
नज़र
आई
तितली
मुझ
को
फिर
बाग़
में
लाई
तितली
आज
की
शब
इसे
रख
ने
दो
बस
छोड़
ही
दूँगा
कल
भाई
तितली
बैठी
है
शाख
पर
एक
तितली
लग
रही
कितनी
ही
छाई
तितली
कौन
है
चाहने
वाला
तुम
को
बैठी
हो
बन
के
आराई
तितली
- Shivang Tiwari
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मुमकिन
है
कि
सदियों
भी
नज़र
आए
न
सूरज
इस
बार
अँधेरा
मिरे
अंदर
से
उठा
है
Aanis Moin
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मैं
खोया
खोया
सा
तेरी
छत
की
जानिब
देख
रहा
हूँ
गीले
कपड़े
सूख
रहे
हैं,
सूखी
आँखें
भीग
रही
हैं
Harman Dinesh
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नज़र
में
रखना
कहीं
कोई
ग़म
शनास
गाहक
मुझे
सुख़न
बेचना
है
ख़र्चा
निकालना
है
Umair Najmi
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हम
तोहफ़े
में
घड़ियाँ
तो
दे
देते
हैं
एक
दूजे
को
वक़्त
नहीं
दे
पाते
हैं
आँखें
ब्लैक
एंड
व्हाइट
हैं
तो
फिर
इन
में
रंग
बिरंगे
ख़्वाब
कहाँ
से
आते
हैं?
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Fareeha Naqvi
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अदाकार
के
कुछ
भी
बस
का
नहीं
है
मोहब्बत
है
ये
कोई
ड्रामा
नहीं
है
जिसे
तेरी
आँखें
बताती
हैं
रस्ता
वो
राही
कहीं
भी
पहुँचता
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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ये
वो
क़बीला
है
जो
हुस्न
को
ख़ुदा
माने
यहाँ
पे
कौन
तेरी
बात
का
बुरा
माने
इशारा
कर
दिया
है
आपकी
तरफ़
मैंने
ये
बच्चे
पूछ
रहे
थे
कि
बे-वफ़ा
माने
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Kushal Dauneria
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जो
बिस्मिल
बना
दे
वो
क़ातिल
तबस्सुम
जो
क़ातिल
बना
दे
वो
दिलकश
नज़ारा
मोहब्बत
का
भी
खेल
नाज़ुक
है
कितना
नज़र
मिल
गई
आप
जीते
मैं
हारा
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Nushur Wahidi
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नदी
आँखें
भँवर
ज़ुल्फ़ें
कहाँ
तैरूँ
कहाँ
डूबूँ
कि
तेरे
शहर
में
सब
की
अदाएँ
एक
जैसी
हैं
Divyansh "Dard" Akbarabadi
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देखने
के
लिए
सारा
आलम
भी
कम
चाहने
के
लिए
एक
चेहरा
बहुत
Asad Badayuni
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घूमता
रहता
है
हर
वक़्त
मेरी
आँखों
में
एक
चेहरा
जो
कई
साल
से
देखा
भी
नहीं
Riyaz Tariq
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गर
दिखाना
है
तो
ता-उम्र
दिखा
ये
जज़्बा
एक
दिन
का
ये
तिरा
इश्क़-ए-वतन
ठीक
नहीं
Shivang Tiwari
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मुझे
जिस
सेे
मुहब्बत
थी
उसे
भी
मुझ
सेे
चाहत
थी
बिछड़
के
जलने
वालों
को
यहीं
बस
थोड़ी
राहत
थी
नज़र
तुम
क्यूँ
नहीं
आते
हमें
भी
ये
शिकायत
थी
तुम्हें
पाना
मिरी
जानाँ
मिरे
दिल
की
ये
हसरत
थी
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Shivang Tiwari
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सिर्फ़
कपड़े
न
लाइए
साहिब
दिल
भी
थोड़ा
सजाइए
साहिब
जो
गया
भूल
जाइए
उसको
ख़्वाब
दूजा
सजाइए
साहिब
रात
गुज़री
है
दिन
बनाने
में
दिन
में
रातें
बनाइए
साहिब
थक
गए
ख़्वाब-ए-ज़ीस्त
ढोने
में
चाय
पीते
हैं
आइए
साहिब
गीला
हो
कर
कहा
ये
तकिए
ने
जो
हुआ
भूल
जाइए
साहिब
तब
कहीं
आएँगे
नए
पौधे
पहले
ख़ुद
को
मिटाइए
साहिब
क्या
ज़लीलों
की
बात
का
लेना
छोड़िए
मुस्कुराइए
साहिब
क्या
ख़बर
साँप
काम
के
निकलें
इनसे
रिश्ता
बनाइए
साहिब
आए
हक़
की
तलाश
में
शैतान
इनको
गीता
पढ़ाइए
साहिब
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Shivang Tiwari
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ज़िन्दगी
यूँँ
बिता
रहा
हूँ
मैं
दूर
ख़ुद
से
ही
जा
रहा
हूँ
मैं
कल
को
बेहतर
बनाने
की
ख़ातिर
आज
को
भी
गँवा
रहा
हूँ
मैं
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Shivang Tiwari
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हों
जवाँ
जब
समझ
नहीं
आता
सब्र
मतलब
समझ
नहीं
आता
तजरबे
उम्र
से
ही
मिलते
हैं
ये
मगर
तब
समझ
नहीं
आता
अजनबी
जाने
कौन
है
उस
में
आइना
अब
समझ
नहीं
आता
कोई
रहबर
पता
बताए
मुझे
है
कहाँ
रब
समझ
नहीं
आता
क्यूँँ
लकीरों
में
तुम
नहीं
हो
मेरी
रोता
हूँ
जब
समझ
नहीं
आता
कैसे
कह
दूँ
बिछड़
गया
तुम
सेे
तुम
मिलीं
कब
समझ
नहीं
आता
दूर
रहने
से
इश्क़
बढ़ता
है
मुझको
साहब
समझ
नहीं
आता
ग़म
ग़लत
शाम
को
जो
करता
हूँ
क्यूँँ
ख़फ़ा
सब
समझ
नहीं
आता
जो
कभी
पीने
बैठ
जाऊँ
शिवम्उठना
है
कब
समझ
नहीं
आता
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Shivang Tiwari
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