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karan singh rajput
main jaanta hooñ meri koshishon se hogaa kuchh nahin
main jaanta hooñ meri koshishon se hogaa kuchh nahin | मैं जानता हूँ मेरी कोशिशों से होगा कुछ नहीं
- karan singh rajput
मैं
जानता
हूँ
मेरी
कोशिशों
से
होगा
कुछ
नहीं
कि
दोस्ती
का
हाथ
ख़ुद
बढ़ाये
वो
ख़ुदा
करे
- karan singh rajput
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फिर
आज
यारों
ने
तुम्हारी
बात
की
फिर
यार
महफ़िल
में
मिरी
खिल्ली
उड़ी
Harsh saxena
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अपनी
बाँहो
से
क्यूँँ
हटाऊँ
उसे
सो
रहा
है
तो
क्यूँँ
जगाऊँ
उसे
जो
भी
मिलता
है
उसका
पूछता
है
यार
किस
किस
से
मैं
छुपाऊँ
उसे
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Kafeel Rana
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दिन
सलीक़े
से
उगा
रात
ठिकाने
से
रही
दोस्ती
अपनी
भी
कुछ
रोज़
ज़माने
से
रही
Nida Fazli
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एक
ही
नदी
के
हैं
ये
दो
किनारे
दोस्तो
दोस्ताना
ज़िंदगी
से
मौत
से
यारी
रखो
Rahat Indori
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तुझे
कौन
जानता
था
मेरी
दोस्ती
से
पहले
तेरा
हुस्न
कुछ
नहीं
था
मेरी
शा'इरी
से
पहले
Kaif Bhopali
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जैसे
पतवार
सफ़ीने
के
लिए
होते
हैं
दोस्त
अहबाब
तो
जीने
के
लिए
होते
हैं
इश्क़
में
कोई
तमाशा
नहीं
करना
होता
अश्क
जैसे
भी
हों
पीने
के
लिए
होते
हैं
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Khalid Nadeem Shani
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इस
से
पहले
कि
बे-वफ़ा
हो
जाएँ
क्यूँँ
न
ऐ
दोस्त
हम
जुदा
हो
जाएँ
Ahmad Faraz
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रातें
किसी
याद
में
कटती
हैं
और
दिन
दफ़्तर
खा
जाता
है
दिल
जीने
पर
माएल
होता
है
तो
मौत
का
डर
खा
जाता
है
सच
पूछो
तो
'तहज़ीब
हाफ़ी'
मैं
ऐसे
दोस्त
से
आज़िज़
हूँ
मिलता
है
तो
बात
नहीं
करता
और
फोन
पे
सर
खा
जाता
है
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Tehzeeb Hafi
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मैं
दिल
को
सख़्त
करके
उस
गली
जा
तो
रहा
हूँ
दोस्त
करूँँगा
क्या
अगर
वो
ही
शरारत
पर
उतर
आया
Harsh saxena
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क़फस
उदास
है
यारों
सबास
कुछ
तो
कहो
कहीं
तो
बहरे-खुदा
आज
ज़िक्र-ए-यार
चले
Faiz Ahmad Faiz
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मुहब्ब्त
कुछ
दिनों
का
साथ
है
बस
मुहब्ब्त
में
रखा
कुछ
भी
नहीं
है
karan singh rajput
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मुझे
तुम
नया
ज़ख़्म
दे
दो
मेरी
जाँ
बड़े
दिन
से
कोई
ग़ज़ल
नईं
हुई
है
karan singh rajput
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अब
जो
तेरे
क़रीब
है
वो
कितना
ख़ुशनसीब
है
karan singh rajput
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चार
ही
दिन
थे
क्या
ज़िन्दगी
के
लिए
ना
मिला
कोई
भी
आशिक़ी
के
लिए
हाथ
आँखों
पे
धरने
लगा
चाँद
अब
एक
उस
की
ही
बेपर्दगी
के
लिए
पूजते
है
उसे
जो
कि
दिखता
नहीं
लोग
सब
करते
है
बंदगी
के
लिए
देता
है
तो
दे
इक
दो
सदी
ऐ
ख़ुदा
चार
दिन
कम
है
आवारगी
के
लिए
ना
गिला
कोई
ना
ही
शिकायत
कोई
कुछ
तो
हो
उन
सेे
नाराजगी
के
लिए
आदमी
देता
है
हर
जहाँ
को
ख़ुशी
ख़ुद
तरसता
है
इक
इक
ख़ुशी
के
लिए
दुख
भरी
ज़िन्दगी
के
सिवा
दुनिया
में
अब
बचा
ही
क्या
है
आदमी
के
लिए
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karan singh rajput
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उसे
मैं
क्या
कहूंगा
और
वो
क्या
समझेगी
अभी
नादाँ
है
वो
मिरी
बात
कहाँ
समझेगी
karan singh rajput
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