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karan singh rajput
gaav men sab use dekhte rah ga.e
gaav men sab use dekhte rah ga.e | गाँव में सब उसे देखते रह गए
- karan singh rajput
गाँव
में
सब
उसे
देखते
रह
गए
यूँँ
गली
से
मेरी
गुज़री
अब
क्या
कहें
- karan singh rajput
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एहसान
तेरा
पिछला
चुकाया
नहीं
गया
मुश्किल
में
अबकी
बार
बुलाया
नहीं
गया
मैं
तुझ
सेे
मिलने
आ
गया
हूँ
तेरे
शहर
तक
और
तुझ
सेे
रेलगाड़ी
तक
आया
नहीं
गया
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Tanoj Dadhich
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जि
यूँँगी
किस
तरह
तेरे
बिना
मत
फिक्र
कर
इसकी
गुज़रती
जिस
शहरस
हूँ
दिवाने
छोड़
आती
हूँ
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Parul Singh "Noor"
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इसी
फ़कीर
की
गफ़लत
से
आगही
ली
है
मेरे
चराग़
से
सूरज
ने
रौशनी
ली
है
गली-गली
में
भटकता
है
शोर
करता
हुआ
हमारे
इश्क़
ने
सस्ती
शराब
पी
ली
है
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Ammar Iqbal
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रोज़
बस्ते
हैं
कई
शहर
नए
रोज़
धरती
में
समा
जाते
हैं
Kaifi Azmi
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ऐसा
बदला
हूँ
तिरे
शहर
का
पानी
पी
कर
झूट
बोलूँ
तो
नदामत
नहीं
होती
मुझ
को
Shahid Zaki
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मेरे
ही
संग-ओ-ख़िश्त
से
तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे
ही
घर
को
शहर
में
शामिल
कहा
न
जाए
Majrooh Sultanpuri
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और
क्या
चाहती
है
गर्दिश-ए-अय्याम
कि
हम
अपना
घर
भूल
गए
उन
की
गली
भूल
गए
Jaun Elia
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उसको
शहर
की
सड़कें
अच्छी
लगती
हैं
मेरा
क्या
है
मुझको
चलना
पड़ता
है
Kafeel Rana
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मुझ
को
कहानियाँ
न
सुना
शहर
को
बचा
बातों
से
मेरा
दिल
न
लुभा
शहर
को
बचा
Taimur Hasan
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ये
मयकशों
का
तवाज़ुन
भी
क्या
तवाज़ुन
है
खड़े
भी
रहना
सहूलत
से
लड़खड़ाना
भी
हमारे
शहर
के
लोगों
को
ख़ूब
आता
है
किसी
को
सर
पे
बिठाना
भी
और
गिराना
भी
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Imran Aami
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मोहब्बत
को
जीने
की
वजह
न
समझो
मोहब्बत
से
भी
ये
दिल
ऊक
जाएगा
karan singh rajput
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हमने
भी
इक
ज़हर
तो
पिया
है
पर
गिला
ये
कि
ज़िंदा
हैं
अब
तक
karan singh rajput
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कि
अब
तो
नींद
से
भी
है
तमाम
सी
शिकायतें
न
जाने
बात
क्या
है
जो
नज़र
में
आती
ही
नहीं
karan singh rajput
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ज़बाँ
पे
आती
है
जब
भी
कभी
उस
यार
की
बातें
नहीं
होती
है
मुझ
सेे
फिर
तो
ये
बेकार
की
बातें
ग़ज़ल
लिखने
भी
बैठूँ
तो
यही
होता
है
मेरे
साथ
कभी
चेहरे
की
उसके
तो
कभी
रुख़सार
की
बातें
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karan singh rajput
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ईद
पर
भी
मुझ
सेे
मिलने
कोई
नईं
आया
'करन'
ईद
को
भी
मैं
अकेला
ही
मनाके
सो
गया
karan singh rajput
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