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karan singh rajput
zabaan pe aati hai jab bhi kabhi us yaar ki baatein
zabaan pe aati hai jab bhi kabhi us yaar ki baatein | ज़बाँ पे आती है जब भी कभी उस यार की बातें
- karan singh rajput
ज़बाँ
पे
आती
है
जब
भी
कभी
उस
यार
की
बातें
नहीं
होती
है
मुझ
सेे
फिर
तो
ये
बेकार
की
बातें
ग़ज़ल
लिखने
भी
बैठूँ
तो
यही
होता
है
मेरे
साथ
कभी
चेहरे
की
उसके
तो
कभी
रुख़सार
की
बातें
- karan singh rajput
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क्यूँँ
चलते
चलते
रुक
गए
वीरान
रास्तो
तन्हा
हूँ
आज
मैं
ज़रा
घर
तक
तो
साथ
दो
Adil Mansuri
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किसी
ने
ख़्वाब
में
आकर
मुझे
ये
हुक्म
दिया
तुम
अपने
अश्क
भी
भेजा
करो
दु'आओं
के
साथ
Afzal Khan
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अभी
तो
जाग
रहे
हैं
चराग़
राहों
के
अभी
है
दूर
सहर
थोड़ी
दूर
साथ
चलो
Ahmad Faraz
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आ
जाए
कौन
कब
कहाँ
कैसी
ख़बर
के
साथ
अपने
ही
घर
में
बैठा
हुआ
हूँ
मैं
डर
के
साथ
Pratap Somvanshi
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जो
मेरे
साथ
मोहब्बत
में
हुई
आदमी
एक
दफा
सोचेगा
रात
इस
डर
में
गुजारी
हमने
कोई
देखेगा
तो
क्या
सोचेगा
Tehzeeb Hafi
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मौत
के
साथ
हुई
है
मिरी
शादी
सो
'ज़फ़र'
उम्र
के
आख़िरी
लम्हात
में
दूल्हा
हुआ
मैं
Zafar Iqbal
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साथ
में
तू
मेरे
दो
गाम
तो
चल
सकता
है
इतना
चलने
से
मेरा
काम
तो
चल
सकता
है
तेरे
दिल
में
किसी
शायर
की
जगह
तो
होगी
इस
इलाके
में
मेरा
नाम
तो
चल
सकता
है
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Ashu Mishra
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बारिशें
जाड़े
की
और
तन्हा
बहुत
मेरा
किसान
जिस्म
और
इकलौता
कंबल
भीगता
है
साथ-साथ
Parveen Shakir
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कितनी
मुश्किल
के
बाद
टूटा
है
एक
रिश्ता
कभी
जो
था
ही
नहीं
Shahbaz Rizvi
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अब
मज़ीद
उस
सेे
ये
रिश्ता
नहीं
रक्खा
जाता
जिस
सेे
इक
शख़्स
का
पर्दा
नहीं
रक्खा
जाता
पढ़ने
जाता
हूँ
तो
तस्में
नहीं
बाँधे
जाते
घर
पलटता
हूँ
तो
बस्ता
नहीं
रक्खा
जाता
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Tehzeeb Hafi
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ये
इश्क़
का
सफ़र
तो
ठीक
पर
रास्ता
अजीब
है
karan singh rajput
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बिछड़कर
मुझ
सेे
रस्ते
में
कहीं
पे
तुम
मिलोगी
जब
वही
तुम
होगी
,
वो
ही
मैं
,
नया
कुछ
भी
नहीं
होगा
karan singh rajput
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देख
ना
पाता
था
जिसको
बात
करते
मैं
किसी
से
अब
किसी
के
साथ
उसको
देखना
भी
पड़
रहा
है
karan singh rajput
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भले
ही
इन
जख्मो
में
जरा
भी
रिवायत
नहीं
मगर
अब
मुझको
भी
किसी
से
शिकायत
नहीं
karan singh rajput
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जाने
क्यूँँ
कुछ
और
दिखता
ही
नहीं
सामने
जब
चेहरा
तेरा
होता
है
karan singh rajput
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