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karan singh rajput
haan ke ab do hisso men bat ga.e ham
haan ke ab do hisso men bat ga.e ham | हाँ के अब दो हिस्सो में बट गए हम
- karan singh rajput
हाँ
के
अब
दो
हिस्सो
में
बट
गए
हम
यानी
जो
करना
नहीं
था
कर
गए
हम
देखकर
मुझको
चुरा
ली
नजरें
तुमने
ऐ
सुनो
क्या
तुम
सेे
इतना
कट
गए
हम
अब
वो
क्यूँँ
नाराज
है
हम
सेे
भला
के
अब
तो
उसके
रास्ते
से
हट
गए
हम
कल
कहा
उसने
कि
अब
मैं
जा
रही
हूँ
यानी
के
कल
मरते
मरते
मर
गए
हम
अब
किसी
से
मोहब्बत
क्या
हो
सकेगी
मोहब्बत
के
नाम
से
ही
डर
गए
हम
- karan singh rajput
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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मैं
तेरे
साथ
सितारों
से
गुज़र
सकता
हूँ
कितना
आसान
मोहब्बत
का
सफ़र
लगता
है
Bashir Badr
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मुक़र्रर
दिन
नहीं
तो
लम्हा-ए-इमकान
में
आओ
अगर
तुम
मिल
नहीं
सकती
तो
मेरे
ध्यान
में
आओ
बला
की
ख़ूब-सूरत
लग
रही
हो
आज
तो
जानाँ
मुझे
इक
बात
कहनी
थी
तुम्हारे
कान
में..
आओ
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Darpan
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मेरा
बटुआ
नहीं
होता
है
ख़ाली
तेरी
तस्वीर
की
बरकत
रही
माँ
Satya Prakash Soni
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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मेरे
होंठों
के
सब्र
से
पूछो
उसके
हाथों
से
गाल
तक
का
सफ़र
Mehshar Afridi
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बहुत
क़रीब
रही
है
ये
ज़िन्दगी
हम
से
बहुत
अज़ीज़
सही
ए'तिबार
कुछ
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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सिवा
इसके
कुछ
अच्छा
ही
नहीं
लगता
है
शामों
में
सफ़र
कैसा
भी
हो
घर
को
परिंदे
लौट
जाते
हैं
Aarush Sarkaar
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नहीं
निगाह
में
मंज़िल
तो
जुस्तुजू
ही
सही
नहीं
विसाल
मुयस्सर
तो
आरज़ू
ही
सही
Faiz Ahmad Faiz
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आज
भी
शायद
कोई
फूलों
का
तोहफ़ा
भेज
दे
तितलियाँ
मंडला
रही
हैं
काँच
के
गुल-दान
पर
Shakeb Jalali
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मेरी
ज़िन्दगी
का
सहारा
किताबें
नदी
हूँ
मैं
,
मेरा
किनारा
किताबें
कई
काग़ज़ों
पे
खिले
फूल
ख़ुद
ही
कि
जिस
रोज़
मैंने
पुकारा
किताबें
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karan singh rajput
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ख़ामोश
मत
रहा
करो,
बताओ
कुछ,
बताती
हुई
अच्छी
लगती
हो
ये
क्या
है
मायूश
क्यूँ
हो,
मुस्कराओ,
मुस्कराती
हुई
अच्छी
लगती
हो
karan singh rajput
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सोचा
उस
सेे
गिला
करूँँगा
मैं
यानी
अब
कुछ
नया
करूँँगा
मैं
घबरा
मत
तू
मैं
पास
हूँ
तेरे
आते
जाते
मिला
करूँँगा
मैं
जब
सतायेगा
डर
अँधेरे
का
तब
दिया
बन
जला
करूँँगा
मैं
साथ
जब
कोई
भी
नहीं
देगा
साथ
तब
भी
चला
करूँँगा
मैं
शा'इरी
की
तरह
हो
जाना
तुम
रोज़
तुमको
पढ़ा
करूँँगा
मैं
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karan singh rajput
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मुझको
भी
बदनाम
करके
कहता
है
सारा
ज़माना
यार
तुम
तो
आज
कल
मशहूर
होते
जा
रहे
हो
karan singh rajput
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तू
जो
कहती
है
वही
कर
देता
हूँ
मैं
ये
मुझ
सेे
इनकार
क्यूँ
नहीं
होता
karan singh rajput
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