manzil-e-maksud pa ke bhi sukoon haasil nahin | मंज़िल-ए-मकसूद पा के भी सुकूँ हासिल नहीं

  - Aman Kumar Shaw "Haif"
मंज़िल-ए-मकसूदपाकेभीसुकूँहासिलनहीं
गयामैंजिसजगहशायदमेरीमंज़िलनहीं
आसराहैकश्तियोंकोसाहिल-ए-आबादका
क्यासफ़ीनेंकामआएगरकोईसाहिलनहीं
हौसलेभीपस्तहोतेदेखेहैंउनकेयहाँ
कहतेथेजोबारहाकेज़िन्दगीमुश्किलनहीं
घोटतेहैंसबगलाजबअपनेअरमानोंकायाँ
कौनफिरदावाकरेकेअपनावोक़ातिलनहीं
पीठपेखंज़रचुभोकेइश्क़मेंतूख़ुशहो
होशखोबैठामगरवोशख़्सहैग़ाफ़िलनहीं
खींचतीहैख़ाकसबकोबारहाअपनीतरफ़
इस
मेंजबतकमिलजाएआदमीकामिलनहीं
लाशअपनीसरपेरखकरफिररहाहूँदरदर
मेरेजैसादुनियामेंहोगाकोईहामिलनहीं
ढ़ूंढ़नामुझकोयारोइसजहाँकीभीड़में
भीड़काहिस्सा"अमन"हूँभीड़मेंशामिलनहीं
  - Aman Kumar Shaw "Haif"
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