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Sahir banarasi
kabhi kabhi mata-e-zindagi udaai gaii
kabhi kabhi mata-e-zindagi udaai gaii | कभी कभी मता-ए-ज़िंदगी उड़ाई गई
- Sahir banarasi
कभी
कभी
मता-ए-ज़िंदगी
उड़ाई
गई
कभी
शराब
बिठा
के
हमें
पिलाई
गई
सुना
के
क़िस्सा
मुहब्बत
का
हमको
यारों
कोई
क़सम
वफ़ा
की
हमें
झूटी
फिर
दिलाई
गई
मुफ़ाइलुन
फ़इलातुन
का
खेल
भी
है
अजब
ग़म-ए-फ़िराक़
से
फिर
शा'इरी
कराई
गई
मिलें
जो
उन
सेे
तो
'साहिर'
ये
पूछना
कभी
तुम
वो
बात
जिस
में
था
वो
क्यूँ
वहाँ
दबाई
गई
- Sahir banarasi
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ग़म
है
उलझन
है
तन्हाई
है
इस
सेे
अच्छा
तो
मर
ही
जाते
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रगों
में
दौड़ता
है
खूँ
की
तरह
हिंदुस्ताँ
हर
इक
को
मिलता
नहीं
ये
नसीब
अब
साहिर
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जिसे
लोग
कहते
मुहब्बत
है
ज़ालिम
बड़ी
ये
मुहब्बत
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मस्ख़
आना
भी
लाज़मी
है
अब
दूर
जाना
भी
लाज़मी
है
अब
इश्क़
के
क़स
में
और
वादों
का
यूँँ
भुलाना
भी
लाज़मी
है
अब
तेरी
परवाह
क्यूँ
करें
हम
अब
दिल
हटाना
भी
लाज़मी
है
अब
है
मदीने
से
भी
ख़ुदा
गायब
उसका
जाना
भी
लाज़मी
है
अब
साथ
साहिर
के
रह
के
तेरा
फिर
काफ़िराना
भी
लाज़मी
है
अब
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अब
किसी
दूजे
से
उनको
प्यार
है
ये
पुराना
उनका
कारोबार
है
एक
दिन
मिलकर
ख़ुदास
जाना
ये
वो
निभाता
झूठा
इक
किरदार
है
जिसके
क़िस्से
बेवक़ूफ़ी
के
सुने
बन
गया
हम
सबका
वो
सरदार
है
साथ
जिसके
बीता
था
बचपन
मिरा
बन
गया
वो
आज
हिस्सेदार
है
आज
उसकी
बात
सुन
मैं
दंग
था
बाप
उसके
घर
किराएदार
है
जो
लगाते
आग
हैं
उन
सेे
कहो
मुल्क
ये
उनका
भी
तो
घर
बार
है
आज
चुप
है
जो
कभी
चिल्लाती
थी
प्यार
है
हाँ
प्यार
है
बस
प्यार
है
आज
कल
सच
क्यूँ
न
आता
सामने
आज
कल
तो
बिक
गया
अख़बार
है
ये
जो
होंठों
पे
लगी
साहिर
तिरे
चीज़
ये
सिगरेट
बड़ी
बेकार
है
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