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Sahir banarasi
jise log kahte muhabbat
jise log kahte muhabbat | जिसे लोग कहते मुहब्बत
- Sahir banarasi
जिसे
लोग
कहते
मुहब्बत
है
ज़ालिम
बड़ी
ये
मुहब्बत
- Sahir banarasi
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मोहब्बत
एक
ख़ुशबू
है
हमेशा
साथ
चलती
है
कोई
इंसान
तन्हाई
में
भी
तन्हा
नहीं
रहता
Bashir Badr
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उसके
अच्छे
शे'र
नहीं
भाते
हमको
जो
अच्छा
इंसान
नहीं
बन
पाता
है
Tanoj Dadhich
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लोग
टूट
जाते
हैं
एक
घर
बनाने
में
तुम
तरस
नहीं
खाते
बस्तियाँ
जलाने
में
Bashir Badr
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सब
की
हिम्मत
नहीं
ज़माने
में
लोग
डरते
हैं
मुस्कुराने
में
एक
लम्हा
भी
ख़र्च
होता
नहीं
मेरी
ख़ुशियों
को
आने
जाने
में
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Vishal Singh Tabish
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अगर
हुकूमत
तुम्हारी
तस्वीर
छाप
दे
नोट
पर
मेरी
दोस्त
तो
देखना
तुम
कि
लोग
बिल्कुल
फ़ुज़ूल-ख़र्ची
नहीं
करेंगे
Rehman Faris
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इंसाँ
की
ख़्वाहिशों
की
कोई
इंतिहा
नहीं
दो
गज़
ज़मीं
भी
चाहिए
दो
गज़
कफ़न
के
बाद
Kaifi Azmi
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तलब
करें
तो
ये
आँखें
भी
इन
को
दे
दूँ
मैं
मगर
ये
लोग
इन
आँखों
के
ख़्वाब
माँगते
हैं
Abbas rizvi
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समझ
से
काम
जो
लेता
हर
एक
बशर
'ताबाँ'
न
हाहा-कार
ही
मचते
न
घर
जला
करते
Anwar Taban
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रफ़्ता
रफ़्ता
सब
कुछ
समझ
गया
हूँ
मैं
लोग
अचानक
टैरेस
से
क्यूँ
कूद
गए
Shadab Asghar
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ज़िक्र
तबस्सुम
का
आते
ही
लगते
हैं
इतराने
लोग
और
ज़रा
सी
ठेस
लगी
तो
जा
पहुँचे
मयख़ाने
लोग
Ateeq Allahabadi
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ये
कौन
दिल
पे
दे
रहा
दस्तक
ख़बर
नहीं
लगता
है
इसको
अब
भी
मुहब्बत
का
डर
नहीं
Sahir banarasi
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गले
मिलो
तो
ये
भी
ध्यान
रखना
अब
'साहिर'
हर
इक
से
रस्म-ए-मुहब्बत
नहीं
निभाते
हैं
Sahir banarasi
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फूलों
पे
इतनी
पहरा-दारी
क्यूँ
भौंरो
पे
सारी
दुनिया-दारी
क्यूँ
Sahir banarasi
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है
दु'आ
उनकी
अब
सलामत
में
थी
ज़ुबाँ
बंद
जो
बग़ावत
में
जुर्म
तेरा
मगर
सज़ा
हमको
ऐसा
होता
तिरी
अदालत
में
छोड़
क्यूँ
तुम
चले
गए
मुझको
थी
कमी
क्या
मिरी
इबादत
में
देखते
अब
न
वो
हमें
मुड़
के
कौन
है
करता
ऐसा
रुख़्सत
में
काटते
दिन
है
आज
कल
ऐसे
ग़ज़लें
पढ़ते
हुए
यूँँ
फ़ुर्क़त
में
अब
मुहब्बत
से
दूर
रहते
हैं
हीर
राँझा
हैं
मिलते
जन्नत
में
मुल्क
की
बात
अब
नहीं
होती
ये
बुरा
हो
गया
सियासत
में
लोग
खाते
है
काट
इंसाँ
को
ऐसा
मुमकिन
था
इतनी
वहशत
में
फेंकते
हैं
ये
लोग
अब
पत्थर
जीना
दूभर
है
ऐसी
दहशत
में
छोड़
हम
कैसे
देते
सिगरेट
को
है
ये
तोहफ़ा
मिला
मुहब्बत
में
राम
पैदा
जहाँ
हुए
'साहिर'
है
मिली
वो
ज़मीं
विरासत
में
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Sahir banarasi
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मैंने
ख़ुदा
क्या
माँगा
था
तुझ
सेे
ख़ुदा
ही
बस
फिर
क्यूँ
मुझे
कर
ख़ुद
से
दिया
यूँँ
जुदा
ही
बस
Sahir banarasi
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