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shampa andaliib
usii ke rang men ab dhal chuki hooñ
usii ke rang men ab dhal chuki hooñ | उसी के रंग में अब ढल चुकी हूँ
- shampa andaliib
उसी
के
रंग
में
अब
ढल
चुकी
हूँ
किसी
की
सम्त
इतना
चल
चुकी
हूँ
उतरता
ही
नहीं
है
रंग
जिस
का
मैं
ऐसी
ख़ाक
तन
पर
मल
चुकी
हूँ
मैं
क्यूँँ
ना
ग़ैर
को
अपना
बनाऊँ
अगर
अपनों
के
दिल
को
खल
चुकी
हूँ
किसी
के
मन
की
भी
मैं
हो
न
पाई
और
अपने
आपको
भी
छल
चुकी
हूँ
कोई
भी
रंग
अब
भाता
नहीं
है
मैं
अपने
आप
में
अब
ढल
चुकी
हूँ
- shampa andaliib
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हमारी
आँखों
का
काजल
बहा
कर
जो
आया
वो
गया
दिल
को
दुखा
कर
हमारी
कौन
सुनता
चल
दिए
सब
हमें
तकलीफ़
फिर
अपनी
सुना
कर
वो
पंछी
फिर
दोबारा
उड़
न
पाए
किए
आज़ाद
जो
क़ैदी
बना
कर
ख़ुशी
बाँटो
ख़ुशी
से
और
सोचो
किसी
को
क्या
मिला
है
दिल
दुखा
कर
अगर
मुजरिम
हो
तो
फिर
जुर्म
अपना
करो
मंज़ूर
अब
सर
को
झुका
कर
हमारी
आँखें
तो
तकती
रहीं
पर
नहीं
देखा
किसी
ने
दूर
जा
कर
चलो
भरते
हैं
ख़ालीपन
ये
शम्पा
दर-ओ-दीवार
को
बातें
सुना
कर
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तुम्हारा
साथ
जुगनू
की
तरह
अब
हमारी
ज़िंदगी
रौशन
करेगा
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ख़ुदारा
ना-ख़ुदा
कोई
न
आए
अगर
कश्ती
भँवर
की
सम्त
जाए
ज़माने
से
बहुत
जब
तंग
आए
ख़ुदास
राब्ते
अपने
बढ़ाए
गुज़िश्ता
साल
से
पहले
कभी
भी
मुझे
ये
रतजगे
इतने
न
भाए
बहुत
दिन
बाद
ये
जाना
कि
हम
पर
सितम
कुछ
आपने
भी
कम
न
ढाए
मुझे
तकलीफ़
दे
कर
या-इलाही
किसी
की
आँख
में
आँसू
न
आए
मेरी
आँखों
ने
देखे
ख़्वाब
कैसे
मुझे
क़िस्मत
ने
कैसे
दिन
दिखाए
मुझे
उड़ने
का
मौक़ा'
तब
मिला
था
मेरे
सय्याद
ने
जब
पर
जलाए
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जिस
सुब्ह
नाम
आपका
पड़
जाए
कान
में
बाद-ए-सबा
भी
खेलती
है
बालियों
के
साथ
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कैसा
जुनून
है
ये
कहाँ
आ
गई
हूँ
मैं
वो
रास्ता
कहाँ
है
जिधर
से
चली
हूँ
मैं
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