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shampa andaliib
koi taabeer kya nazar aa.e
koi taabeer kya nazar aa.e | कोई ता'बीर क्या नज़र आए
- shampa andaliib
कोई
ता'बीर
क्या
नज़र
आए
ख़्वाब
टूटे
तो
नैन
भर
आए
यूँँ
इज़ाफ़ा
हुआ
मेरे
दुख
में
दुख
के
मारे
भी
मेरे
घर
आए
तेरा
मतलब
निकल
गया
लेकिन
तेरे
इल्ज़ाम
मेरे
सर
आए
इतने
दुख
से
भरी
है
ये
दुनिया
आँख
खुलते
ही
आँख
भर
आए
कब
तलक
राह
तकता
दरवाज़ा
हम
दरीचे
पे
दीप
धर
आए
- shampa andaliib
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हुआ
जौन
को
पढ़
के
मालूम
ये
उदासी
का
भी
इक
कलर
होता
है
Viru Panwar
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ख़ुशी
में
भी
ख़ुशी
होती
नहीं
अब
तेरा
ग़म
ही
सतह
पर
तैरता
है
Umesh Maurya
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उदास
लोग
इसी
बात
से
हैं
ख़ुश
कि
चलो
हमारे
साथ
हुए
हादसों
की
बात
हुई
Abhishar Geeta Shukla
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अपने
क़ातिल
की
ज़ेहानत
से
परेशान
हूँ
मैं
रोज़
इक
मौत
नए
तर्ज़
की
ईजाद
करे
Parveen Shakir
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लोग
हम
सेे
सीखते
हैं
ग़म
छुपाने
का
हुनर
आओ
तुमको
भी
सिखा
दें
मुस्कुराने
का
हुनर
क्या
ग़ज़ब
है
तजरबे
की
भेंट
तुम
ही
चढ़
गए
तुम
से
ही
सीखा
था
हमने
दिल
दुखाने
का
हुनर
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Kashif Sayyed
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हम
ऐसे
लोग
भी
जाने
कहाँ
से
आते
हैं
ख़ुशी
में
रोते
हैं
जो
ग़म
में
मुस्कुराते
हैं
हमारा
साथ
भला
कब
तलक
निभाते
आप
कभी
कभी
तो
हमीं
ख़ुद
से
ऊब
जाते
हैं
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Mohit Dixit
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उदासी
का
सबब
उस
सेे
जो
हम
तब
पूछ
लेते
वजह
फिर
पूछनी
पड़ती
न
शायद
ख़ुद-कुशी
की
Dipendra Singh 'Raaz'
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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जब
भी
आता
है
दिसम्बर
ग़म
के
टाँके
खुलते
हैं
याद
है
यूँँ
तेरा
जाना
और
कहना
ख़ुश
रहो
Neeraj Neer
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ग़म-ए-हयात
ने
आवारा
कर
दिया
वर्ना
थी
आरज़ू
कि
तिरे
दर
पे
सुब्ह
ओ
शाम
करें
Majrooh Sultanpuri
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जिस
घड़ी
यार
मुस्कुराता
है
मेरे
चेहरे
पे
नूर
आता
है
एक
दिन
वक़्त
ही
बताएगा
तेरा
मेरा
कोई
तो
नाता
है
पीठ
पर
घोंपते
हैं
सब
ख़ंजर
कौन
अब
दूर
से
सताता
है
ख़ूब-सूरत
हसीन
चेहरों
पर
वक़्त
भी
ख़ूब
मुस्कुराता
है
दोस्त
कोई
भी
बुत
नहीं
होता
काम
सब
का
निकल
ही
आता
है
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shampa andaliib
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बहुत
से
ख़ास
रिश्तों
में
दरारें
पड़
चुकी
हैं
अब
हमारी
सादगी
दुश्मन
हमारी
बन
गई
यारों
shampa andaliib
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हाथ
अपने
बना
लिए
तेरे
फिर
तिरे
साथ
खेल
ली
होली
shampa andaliib
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तसल्ली
हो
अगर
तिश्नालबों
को
तो
बस
दो
चार
बूँदें
ही
बहुत
हैं
shampa andaliib
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किसी
से
बात
करना
चाहती
हूँ
ख़ुशी
से
बात
करना
चाहती
हूँ
सभी
को
जानना
है
इस
जहाँ
में
सभी
से
बात
करना
चाहती
हूँ
ये
दुनिया
ख़ूब-सूरत
है
मगर
मैं
तुझी
से
बात
करना
चाहती
हूँ
वही
इक
शख़्स
मेरी
सुन
सकेगा
उसी
से
बात
करना
चाहती
हूँ
किसी
की
याद
में
आँसू
बहा
कर
नमी
से
बात
करना
चाहती
हूँ
समझ
पाई
नहीं
मैं
राज़-ए-गुलशन
कली
से
बात
करना
चाहती
हूँ
किसी
की
राह
तकते
थक
गई
अब
घड़ी
से
बात
करना
चाहती
हूँ
अगर
मेरी
सुने
तो
कुछ
घड़ी
मैं
नदी
से
बात
करना
चाहती
हूँ
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shampa andaliib
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