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Shakir Dehlvi
kuchh shikaayat hai to ghar aao kabhi fursat men
kuchh shikaayat hai to ghar aao kabhi fursat men | कुछ शिकायत है तो घर आओ कभी फ़ुर्सत में
- Shakir Dehlvi
कुछ
शिकायत
है
तो
घर
आओ
कभी
फ़ुर्सत
में
मैं
तमाशा
सर-ए-बाज़ार
नहीं
कर
सकता
- Shakir Dehlvi
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नताएज
जब
सर-ए-महशर
मिलेंगे
मोहब्बत
के
अलग
नंबर
मिलेंगे
तुम्हारी
मेज़बानी
के
बहाने
कोई
दिन
हम
भी
अपने
घर
मिलेंगे
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Khurram Afaq
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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जिसे
तुम
काट
आए
उस
शजर
को
ढूँढता
होगा
परिंदा
लौटकर
के
अपने
घर
को
ढूँढता
होगा
Bhaskar Shukla
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एक
मुद्दत
से
हैं
सफ़र
में
हम
घर
में
रह
कर
भी
जैसे
बेघर
से
Azhar Iqbal
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तू
अपने
घर
में
मुहब्बत
की
जीत
पर
ख़ुश
है
अभी
ठहर
के
मेरा
ख़ानदान
बाक़ी
है
Siraj Faisal Khan
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इन
का
उठना
नहीं
है
हश्र
से
कम
घर
की
दीवार
बाप
का
साया
Unknown
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इसी
उम्मीद
से
मैं
देखता
हूँ
रास्ता
उसका
वो
आएगा
ज़मी
बंजर
में
इक
दिन
घर
उगाने
को
Kushal "PARINDA"
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मैं
ये
भी
चाहती
हूँ
तिरा
घर
बसा
रहे
और
ये
भी
चाहती
हूँ
कि
तू
अपने
घर
न
जाए
Rehana Roohi
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जो
बुजुर्गों
की
दु'आओं
के
दीयों
से
रौशन
रोज़
उस
घर
में
दीवाली
का
जश्न
होता
है
Pratap Somvanshi
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सारी
हिम्मत
टूट
गई,
बच्चों
से
ये
सुनकर
अब
भूखे
पेट
गुज़ारा
करने
की
हिम्मत
है
फूँका
घर,
भूखे
बच्चे,
टूटी
उम्मीदें,
अब
मुझ
में,
रस्सी
को
फंदा
करने
की
हिम्मत
है
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Aman G Mishra
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भँवर
ये
देख
कर
हैरत
ज़दा
है
किनारा
कश्तियों
को
खा
रहा
है
Shakir Dehlvi
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आज
नाकाम
हो
गई
फिर
से
एक
कोशिश
उसे
भुलाने
की
Shakir Dehlvi
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टूटें
न
उसके
ख़्वाब
सो
आवाज़
दी
नहीं
ऐसा
नहीं
कि
दर्द
दोबारा
नहीं
हुआ
Shakir Dehlvi
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आसमाँ
जब
ज़मीं
पे
बैठ
गया
जो
जहाँ
था
वहीं
पे
बैठ
गया
कुछ
सितारे
ज़मीं
पे
रौशन
थे
मैं
भी
जाकर
वहीं
पे
बैठ
गया
इक
कबूतर
ख़याल
का
तेरे
उड़
के
आया
जबीं
पे
बैठ
गया
बल्लियों
कूदता
उछलता
दिल
आपकी
इक
नहीं
पे
बैठ
गया
मुफ़्त
में
दे
दिया
मकान-ए-दिल
जब
भरोसा
मकीं
पे
बैठ
गया
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Shakir Dehlvi
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मैं
था
नादान
समझ
ही
नहीं
पाया
वरना
ज़िन्दगी
रोज़
ही
करती
थी
इशारे
मुझको
Shakir Dehlvi
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