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Shakeel Jamali
wafaadaaro'n pe aafat aa rahi hai
wafaadaaro'n pe aafat aa rahi hai | वफ़ादारों पे आफ़त आ रही है
- Shakeel Jamali
वफ़ादारों
पे
आफ़त
आ
रही
है
मियाँ
ले
लो
जो
क़ीमत
आ
रही
है
मैं
उस
से
इतने
वा'दे
कर
चुका
हूँ
मुझे
इस
बार
ग़ैरत
आ
रही
है
न
जाने
मुझ
में
क्या
देखा
है
उस
ने
मुझे
उस
पर
मोहब्बत
आ
रही
है
बदलता
जा
रहा
है
झूट
सच
में
कहानी
में
सदाक़त
आ
रही
है
मिरा
झगड़ा
ज़माने
से
नहीं
है
मिरे
आड़े
मोहब्बत
आ
रही
है
अभी
रौशन
हुआ
जाता
है
रस्ता
वो
देखो
एक
औरत
आ
रही
है
मुझे
उस
की
उदासी
ने
बताया
बिछड़
जाने
की
साअ'त
आ
रही
है
बड़ों
के
दरमियाँ
बैठा
हुआ
हूँ
नसीहत
पर
नसीहत
आ
रही
है
- Shakeel Jamali
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हमारे
लोग
अगर
रास्ता
न
पाएँगे
शिलाएँ
जोड़
के
पानी
पे
पुल
बनाएँगे
फिर
एक
बार
मनेगी
अवध
में
दीवाली
फिर
एक
बार
सभी
रौशनी
में
आएँगे
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Amit Jha Rahi
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हम
जान
से
जाएँगे
तभी
बात
बनेगी
तुम
से
तो
कोई
राह
निकाली
नहीं
जाती
Wasi Shah
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चलते
हुए
मुझ
में
कहीं
ठहरा
हुआ
तू
है
रस्ता
नहीं
मंज़िल
नहीं
अच्छा
हुआ
तू
है
Abhishek shukla
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सफ़र
में
मुश्किलें
आएँ
तो
जुरअत
और
बढ़ती
है
कोई
जब
रास्ता
रोके
तो
हिम्मत
और
बढ़ती
है
Nawaz Deobandi
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दिल
के
तमाम
ज़ख़्म
तेरी
हाँ
से
भर
गए
जितने
कठिन
थे
रास्ते
वो
सब
गुज़र
गए
Kumar Vishwas
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दीवार
क्या
गिरी
मिरे
ख़स्ता
मकान
की
लोगों
ने
मेरे
सेहन
में
रस्ते
बना
लिए
Sibt Ali Saba
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उसूली
तौर
पे
मर
जाना
चाहिए
था
मगर
मुझे
सुकून
मिला
है
तुझे
जुदा
कर
के
Ali Zaryoun
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याद
उसे
भी
एक
अधूरा
अफ़्साना
तो
होगा
कल
रस्ते
में
उस
ने
हम
को
पहचाना
तो
होगा
Javed Akhtar
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कोई
काँटा
कोई
पत्थर
नहीं
है
तो
फिर
तू
सीधे
रस्ते
पर
नहीं
है
मैं
इस
दुनिया
के
अंदर
रह
रहा
हूँ
मगर
दुनिया
मेरे
अंदर
नहीं
है
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Zubair Ali Tabish
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'फ़ैज़'
थी
राह
सर-ब-सर
मंज़िल
हम
जहाँ
पहुँचे
कामयाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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मसअला
ख़त्म
हुआ
चाहता
है
दिल
बस
अब
ज़ख़्म
नया
चाहता
है
Shakeel Jamali
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बोलता
है
तो
पता
लगता
है
ज़ख़्म
उसका
भी
हरा
लगता
है
रास
आ
जाती
है
तन्हाई
भी
एक
दो
रोज़
बुरा
लगता
है
कितनी
ज़ालिम
है
मोहज्जब
दुनिया
घर
से
निकलो
तो
पता
लगता
है
आज
भी
वो
नहीं
आने
वाला
आज
का
दिन
भी
गया
लगता
है
बोझ
सीने
पे
बहुत
है
लेकिन
मुस्कुरा
देने
में
क्या
लगता
है
मूड
अच्छा
हो
तो
सब
अच्छा
है
वर्ना
हँसना
भी
बुरा
लगता
है
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Shakeel Jamali
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कुछ
लोग
हैं
जो
झेल
रहे
हैं
मुसीबतें
कुछ
लोग
हैं
जो
वक़्त
से
पहले
बदल
गए
Shakeel Jamali
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अपने
ख़ून
से
इतनी
तो
उम्मीदें
हैं
अपने
बच्चे
भीड़
से
आगे
निकलेंगे
Shakeel Jamali
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माज़रत
कर
रहा
हूँ
वा'दा
नहीं
इतनी
शर्मिंदगी
ज़ियादा
नहीं
ख़ूब-सूरत
तो
वो
बहुत
है
मगर
ख़ुद-कुशी
का
मेरा
इरादा
नहीं
उसने
सपने
सजा
लिए
हैं
बहुत
और
मैं
कोई
शाहज़ादा
नहीं
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Shakeel Jamali
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