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Shakeel Jamali
bolta hai to pata lagta hai
bolta hai to pata lagta hai | बोलता है तो पता लगता है
- Shakeel Jamali
बोलता
है
तो
पता
लगता
है
ज़ख़्म
उसका
भी
हरा
लगता
है
रास
आ
जाती
है
तन्हाई
भी
एक
दो
रोज़
बुरा
लगता
है
कितनी
ज़ालिम
है
मोहज्जब
दुनिया
घर
से
निकलो
तो
पता
लगता
है
आज
भी
वो
नहीं
आने
वाला
आज
का
दिन
भी
गया
लगता
है
बोझ
सीने
पे
बहुत
है
लेकिन
मुस्कुरा
देने
में
क्या
लगता
है
मूड
अच्छा
हो
तो
सब
अच्छा
है
वर्ना
हँसना
भी
बुरा
लगता
है
- Shakeel Jamali
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ख़मोशी
तो
यही
बतला
रही
है
उदासी
रास
मुझको
आ
रही
है
मुझे
जिन
ग़लतियों
से
सीखना
था
वही
फिर
ज़िंदगी
दोहरा
रही
है
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Vishal Singh Tabish
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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वो
कभी
आग़ाज़
कर
सकते
नहीं
ख़ौफ़
लगता
है
जिन्हें
अंजाम
से
Siraj Faisal Khan
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घर
में
भी
दिल
नहीं
लग
रहा
काम
पर
भी
नहीं
जा
रहा
जाने
क्या
ख़ौफ़
है
जो
तुझे
चूम
कर
भी
नहीं
जा
रहा
रात
के
तीन
बजने
को
है
यार
ये
कैसा
महबूब
है
जो
गले
भी
नहीं
लग
रहा
और
घर
भी
नहीं
जा
रहा
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Tehzeeb Hafi
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अजीब
सानेहा
मुझ
पर
गुज़र
गया
यारो
मैं
अपने
साए
से
कल
रात
डर
गया
यारो
Shahryar
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मज़ा
चहिए
जो
आख़िर
तक
उदासी
से
मोहब्बत
कर
ख़ुशी
का
क्या
है
कब
तब्दील
है
से
थी
में
हो
जाए
Atul K Rai
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ऐसा
लगता
है
कि
तन्हाई
मुझे
छूती
है
उँगलियाँ
कौन
फिरोता
है
मेरे
बालों
में
Ashok Mizaj Badr
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अब
तो
उस
सूने
माथे
पर
कोरेपन
की
चादर
है
अम्मा
जी
की
सारी
सजधज,
सब
ज़ेवर
थे
बाबूजी
कभी
बड़ा
सा
हाथ
ख़र्च
थे
कभी
हथेली
की
सूजन
मेरे
मन
का
आधा
साहस,
आधा
डर
थे
बाबूजी
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Aalok Shrivastav
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हुस्न
ने
शौक़
के
हंगा
में
तो
देखे
थे
बहुत
इश्क़
के
दावा-ए-तक़दीस
से
डर
जाना
था
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Asrar Ul Haq Majaz
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अपनी
इस
आदत
पे
ही
इक
रोज़
मारे
जाएँगे
कोई
दर
खोले
न
खोले
हम
पुकारे
जाएँगे
Waseem Barelvi
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किसी
से
छोटी
सी
एक
उम्मीद
बाँध
लीजिए
मोहब्बतों
का
अगर
जनाज़ा
निकालना
है
Shakeel Jamali
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सफ़र
से
लौट
जाना
चाहता
है
परिंदा
आशियाना
चाहता
है
कोई
स्कूल
की
घंटी
बजा
दे
ये
बच्चा
मुस्कुराना
चाहता
है
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Shakeel Jamali
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कहानी
में
छोटा
सा
किरदार
है
हमारा
मगर
एक
मेआ'र
है
ख़ुदा
तुझ
को
सुनने
की
तौफ़ीक़
दे
मिरी
ख़ामुशी
मेरा
इज़हार
है
ये
कैसे
इलाक़े
में
हम
आ
बसे
घरों
से
निकलते
ही
बाज़ार
है
सियासत
के
चेहरे
पे
रौनक़
नहीं
ये
औरत
हमेशा
की
बीमार
है
हक़ीक़त
का
इक
शाइबा
तक
नहीं
तुम्हारी
कहानी
मज़ेदार
है
तअ'ल्लुक़
की
तजहीज़-ओ-तकफ़ीन
कर
वो
दामन
छुड़ाने
को
तय्यार
है
पड़ोसी
पड़ोसी
से
है
बे-ख़बर
मगर
सब
के
हाथों
में
अख़बार
है
ये
छुट्टी
का
दिन
हम
से
मत
छीनना
यही
हम
ग़रीबों
का
त्यौहार
है
उसे
मश्वरों
की
ज़रूरत
नहीं
वो
तुम
से
ज़ियादा
समझदार
है
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Shakeel Jamali
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मौत
को
हम
ने
कभी
कुछ
नहीं
समझा
मगर
आज
अपने
बच्चों
की
तरफ़
देख
के
डर
जाते
हैं
Shakeel Jamali
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मसअला
ख़त्म
हुआ
चाहता
है
दिल
बस
अब
ज़ख़्म
नया
चाहता
है
कब
तलक
लोग
अंधेरे
में
रहें
अब
ये
माहौल
दिया
चाहता
है
मसअला
मेरे
तहफ़्फ़ुज़
का
नहीं
शहर
का
शहर
ख़ुदा
चाहता
है
मेरी
तन्हाइयांलब
मांगती
हैं
मेरा
दरवाज़ा
सदा
चाहता
है
घर
को
जाते
हुए
शर्म
आती
है
रात
का
एक
बजा
चाहता
है
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Shakeel Jamali
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