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Shahanwaz Ansari
kaun kisi ka sunta dukh hai
kaun kisi ka sunta dukh hai | कौन किसी का सुनता दुख है
- Shahanwaz Ansari
कौन
किसी
का
सुनता
दुख
है
सबको
अपना
अपना
दुख
है
प्यार
मोहब्बत
घर
की
उलझन
सबको
वही
पुराना
दुख
है
तुझ
सेे
जुदा
हो
कर
ही
समझा
आख़िर
कैसा
होता
दुख
है
- Shahanwaz Ansari
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तुझ
को
अपने
लिए
ज़रूरी
लिक्खूँगा
मैं
बिन
तेरे
ज़िंदगी
अधूरी
लिक्खूँगा
मैं
Shahanwaz Ansari
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तू
जो
अगर
हमारा
होता
सब
कुछ
कितना
प्यारा
होता
तुझ
सेे
न
हम
लगाते
दिल
को
न
ग़म
ने
हमको
मारा
होता
क्यूँ
रोते
हो
उसके
ख़ातिर
क्या
वो
कभी
तुम्हारा
होता
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Shahanwaz Ansari
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है
क्या
ज़रूरी
मिरा
ऐसा
करना
सब
भूल
कर
बस
तुझे
सोचा
करना
Shahanwaz Ansari
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है
क्या
ज़रूरी
मिरा
ऐसा
करना
सब
भूल
कर
बस
तुझे
सोचा
करना
आग़ोश
में
अपनी
तुम
मुझको
लेना
हम
गर
मिले
यार
बस
इतना
करना
दिल
पर
मिरे
ज़ख़्म
सा
करता
है
ये
मुझ
से
नज़र
तुम
नहीं
फेरा
करना
ख़ुद
को
ये
कहना
कि
तुझको
न
सोचें
हर
वक़्त
फिर
तुझको
ही
सोचा
करना
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Shahanwaz Ansari
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यूँँ
तुझे
सामने
अपने
मैं
बिठाया
करता
तू
मुझे
देखती
मैं
तुझको
निहारा
करता
देख
कर
मुझको
निगाहें
तू
चुराया
करती
अपनी
आँखों
से
तुझे
मैं
भी
इशारा
करता
तू
मिरे
शानों
पे
सर
रख
के
यूँँ
सोया
करती
मैं
तिरे
ख़ुशबू
को
साँसों
में
समाया
करता
देर
तक
हम
भी
जो
इक
दूजे
से
करते
बातें
मैं
तुझे
अपनी
ग़ज़ल
पहले
सुनाया
करता
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Shahanwaz Ansari
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