sochta hooñ agar samaaj na ho | सोचता हूँ अगर समाज न हो

  - Adnan Ali SHAGAF
सोचताहूँअगरसमाजहो
फिरमुहब्बतमेंशर्मलाजहो
प्यारकेबाँटनेमेंहोमुश्किल
इतनीकसरतसेइज़दिवाजहो
ख़ुदसेकीथीख़राबहालततो
ख़ुदसेक्योंकरमेराइलाजहो
आनेवालोंकोदीजिएरस्ता
जानेवालोंपेएहतिजाजहो
दूसरीबारगरमिलेंहमफिर
चाहतोंकाकोईरिवाजहो
मानलेताहूँहिज्रक़िस्मतहै
जबभीहोनाहोपरयेआजहो
जोभीआएतोउसकासरचू
में
कोईइतनाभीख़ुश-मिज़ाजहो
  - Adnan Ali SHAGAF
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