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SWAPNIL YADAV 'NIL'
maan karke wafa ki sab shartein
maan karke wafa ki sab shartein | मान करके वफ़ा की सब शर्तें
- SWAPNIL YADAV 'NIL'
मान
करके
वफ़ा
की
सब
शर्तें
हमने
दुनिया
सँभाल
रक्खी
है
- SWAPNIL YADAV 'NIL'
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शर्तें
लगाई
जाती
नहीं
दोस्ती
के
साथ
कीजे
मुझे
क़ुबूल
मिरी
हर
कमी
के
साथ
Waseem Barelvi
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ये
जो
दुनिया
है
इसे
इतनी
इजाज़त
कब
है
हम
पे
अपनी
ही
किसी
बात
का
ग़ुस्सा
उतरा
Abhishek shukla
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जी
तो
ये
चाहता
है
मर
जाएँ
ज़िंदगी
अब
तिरी
रज़ा
क्या
है
Anwar Taban
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तेरे
ही
लिए
आएँगे
तेरे
पास
किसी
से
बिछड़कर
नहीं
आएँगे
बुरा
मानिए
तो
बुरा
मानिए
इजाज़त
तो
लेकर
नहीं
आएँगे
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Shariq Kaifi
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रुख़्सार
का
दे
शर्त
नहीं
बोसा-ए-लब
से
जो
जी
में
तिरे
आए
सो
दे
यार
मगर
दे
Maatam Fazl Mohammad
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कुछ
तो
मिल
जाए
लब-ए-शीरीं
से
ज़हर
खाने
की
इजाज़त
ही
सही
Arzoo Lakhnavi
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वो
शादी
तो
करेगी
मगर
एक
शर्त
पर
हम
हिज्र
में
रहेंगे
अगर
नौकरी
नहीं
Harsh saxena
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ऐसी
सर्दी
में
शर्त
चादर
है
ओढ़ने
की
हो
या
बिछौने
की
Paras Mazari
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हमें
ये
जिस
तरह
से
ख़्याल
तेरा
खेंच
लेता
है
लगा
ले
शर्त,
तुझ
सेे
ग्रैविटी
ने
हार
जाना
है
Nawaaz
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फ़ैसला
बिछड़ने
का
कर
लिया
है
जब
तुम
ने
फिर
मिरी
तमन्ना
क्या
फिर
मिरी
इजाज़त
क्यूँँ
Ambreen Haseeb Ambar
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सरहदे-मौत
पर
भी
मिली
ही
नहीं
है
कि
हिस्से
मेरे
ज़िन्दगी
ही
नहीं
ख़ामुशी
है
उदासी
व
अफ़सुर्दगी
शामिले-जश्न
है
ख़ुद-कुशी
ही
नहीं
एक
लड़की
कि
जिसका
दिखा
अक़्स
था
चौक
पर
ही
वो
थी
और
थी
ही
नहीं
माँगती
और
बोसा
है
तिश्ना
जबीं
अज़्ल
की
आग
है
ये
बुझी
ही
नहीं
जाएँ
रोने
कहाँ
ऐ
ख़ुदा
तू
बता
है
कि
दुनिया
में
अब
तीरगी
ही
नहीं
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SWAPNIL YADAV 'NIL'
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आपका
अक्स
मुझ
में
अमृत
था
आपका
हिज्र
दिल
पे
आरी
है
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हम
लेटे
रहते
हैं
पीकर
इतने
जाम
उदासी
के
इक
साक़ी
सी
दुनिया
आगे
रक़्स
हमारे
करती
है
SWAPNIL YADAV 'NIL'
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ये
कभी
मुख़्तसर
नहीं
आती
ज़िन्दगी
पर
नज़र
नहीं
आती
आपके
याँ
ही
मौत
मुर्दों
को
आती
होगी
इधर
नहीं
आती
ग़म
यही
है
कि
आह
अब
मेरे
जिस्म
को
चीर
कर
नहीं
आती
मौत
भी
दिल
दुखायगी
मेरा
मौत
भी
वक़्त
पर
नहीं
आती
तब
मुझे
चैन
ही
नहीं
पड़ता
तीरगी
जब
नज़र
नहीं
आती
वो
कोई
रेल
है
कि
रौनक
है
गुम
है,
मेरे
शहर
नहीं
आती
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तुम्हारे
पास
जब
शाना
नहीं
था
मेरी
सुननी
थी
समझाना
नहीं
था
ये
कैसी
ज़िन्दगी
है
ज़िन्दगी
सुन
हमें
तो
इस
तरफ़
आना
नहीं
था
मैं
सोया
पत्थरों
पे
बाम
धरकर
कोई
अपना
कोई
शाना
नहीं
था
सभी
के
दिल
में
शहनाई
बजी
है
तुझे
ऐ
दोस्त
मुस्काना
नहीं
था
तुझे
कैसे
पता
हैं
दर्द
मेरे
तुझे
तो
यार
भी
माना
नहीं
था
बहुत
आज़ाद
था
मैं
कल
की
शब
को
मेरे
रोने
पे
जुर्माना
नहीं
था
मैं
कश्ती
ख़ुद
डुबोना
चाहता
हूँ
मुझे
उस
पार
भी
जाना
नहीं
था
गई
शब
बाग़
में
कोई
न
बोला
परिंदों
ने
भी
पहचाना
नहीं
था
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