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Shaad Imran
waqt aawaargi men zaayaa' kiya
waqt aawaargi men zaayaa' kiya | वक़्त आवारगी में ज़ाया' किया
- Shaad Imran
वक़्त
आवारगी
में
ज़ाया'
किया
दर्द
को
शा'इरी
में
ज़ाया'
किया
जब
भी
मौक़ा
मिला
मोहब्बत
का
शैख़
ने
बंदगी
में
ज़ाया'
किया
मुझ
से
ग़लती
हुई
कि
तुझ
सा
चराग़
हल्की
सी
तीरगी
में
ज़ाया'
किया
इक
मिला
था
मुझे
तेरे
जैसा
जिसको
तेरी
कमी
में
ज़ाया'
किया
हुस्न
होता
है
नाज़
करने
को
तूने
क्यूँँ
सादगी
में
जाया
किया
कुल
मेरी
उम्र
के
बराबर
है
वक़्त
जो
ज़िन्दगी
में
ज़ाया'
किया
शाद
जैसे
को
भी
रक़ीबों
ने
आपसी
दुश्मनी
में
ज़ाया'
किया
- Shaad Imran
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मेरी
तन्हाई
देखेंगे
तो
हैरत
ही
करेंगे
लोग
मोहब्बत
छोड़
देंगे
या
मोहब्बत
ही
करेंगे
लोग
Ismail Raaz
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डर
मुझे
मेरी
मुहब्बत
एक
दिन
खो
जाएगी
यार
मुझको
लग
रहा
वो
ग़ैर
की
हो
जाएगी
मैं
सभी
वादे
पुराने
ही
निभाते
जाऊँगा
और
वो
जाकर
किसी
की
बाँह
में
सो
जाएगी
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Ravi 'VEER'
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हसीं
ख़्वाबों
को
अपने
साथ
में
ढोती
हुई
आंँखे
बहुत
प्यारी
लगी
हमको
तेरी
सोती
हुई
आंँखे
मोहब्बत
में
ये
दो
क़िस्से
सुना
है
रोज़
होते
हैं
कभी
हँसता
हुआ
चेहरा
कभी
रोती
हुई
आंँखे
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Naimish trivedi
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कभी
ये
भी
नहीं
पूछा
है
गर्दन
पे
निशाँ
कैसा
हमें
अंधी
मोहब्बत
थी
हमें
अंधा
भरोसा
था
Shayra kirti
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ये
कहना
था
उन
से
मोहब्बत
है
मुझ
को
ये
कहने
में
मुझ
को
ज़माने
लगे
हैं
Khumar Barabankvi
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मुहब्बत
के
समुंदर
की
कलाकारी
ग़ज़ब
की
है
कि
सब
कुछ
डूब
जाता
है
मगर
तर
कुछ
नहीं
होता
Muntazir Firozabadi
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सँभलने
के
लिए
कर
ली
मुहब्बत
मगर
इस
में
फिसलना
चाहिए
था
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Divy Kamaldhwaj
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कहीं
पड़े
न
मोहब्बत
की
मार
होली
में
अदास
प्रेम
करो
दिल
से
प्यार
होली
में
Nazeer Banarasi
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क़ब्रों
में
नहीं
हम
को
किताबों
में
उतारो
हम
लोग
मोहब्बत
की
कहानी
में
मरे
हैं
Ajaz tawakkal
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दिल
में
जो
मोहब्बत
की
रौशनी
नहीं
होती
इतनी
ख़ूब-सूरत
ये
ज़िंदगी
नहीं
होती
Hastimal Hasti
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आजकल
हम
जफ़ा
पे
लिखते
हैं
यानी
तेरी
अदा
पे
लिखते
हैं
दिल
कभी
दीवार
और
कभी-कभी
तो
हम
तिरा
नाम
हवा
पे
लिखते
हैं
ज़िन्दगी
खेल
नहीं
पतंगों
का
चलो
ये
आसमाँ
पे
लिखते
हैं
आज
फिर
याद
घर
की
आई
है
आज
फिर
कुछ
माँ
पे
लिखते
हैं
'शाद'
क्या
दौर
आया
शा'इरी
का
लोग
सिर्फ़
बे-वफ़ा
पे
लिखते
हैं
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Shaad Imran
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तुमने
बस
बाज़ार
में
जल्वे
देखे
हैं
हमने
भीड़
में
खोते
बच्चे
देखे
हैं
इन
आँखों
से
दरिया
फूटना
लाज़िम
था
इन
आँखों
ने
मंज़र
ऐसे
देखे
हैं
औरों
ने
दौलत
शोहरत
भी
चाही
है
हमने
तो
बस
उसके
सपने
देखे
हैं
उसकी
ख़ातिर
जंग
नहीं
देखी,
लेकिन
कालेज
में
सब
लड़के
लड़ते
देखे
हैं
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Shaad Imran
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फूल
थम
से
गए
गिरना
शजर
से
गाँव
तुम
लौट
आए
जब
शहरस
दिल
में
ख़्वाहिश
है
तेरा
चेहरा
देखूँ
आँख
हटती
नहीं
लेकिन
नज़र
से
जाँ
तिरे
होंठों
को
चूमने
वाले
मर
न
जाए
किसी
रोज़
शकर
से
जिसको
मज़हब
का
कोई
इल्म
न
हो
दोस्ती
कीजियेगा
ऐसे
बेख़बर
से
उसके
घरवालों
ने
'शाद'
कह
दिया
है
बेटी
बियाहेंगे
सिर्फ़
आफ़िसर
से
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Shaad Imran
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मेरे
हाथों
में
अपना
हाथ
रखकर
कहा
उसने
कभी
ये
हाथ
तो
न
छोड़ोगे
Shaad Imran
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हम
अगर
वक़्त
पे
जो
मर
जाते
कितने
ही
हादसे
ठहर
जाते
होते
ईसा
अगर
अभी
मौजूद
देख
कर
ज़ख़्म
मेरे
डर
जाते
काश
वो
इंतज़ार
में
रहता
काश
दफ़्तर
से
हम
भी
घर
जाते
'जौन'
का
शे'र
बस
सुना
देता
जान
कुरबान
उस
पे
कर
जाते
"शाद"
तुम
छोड़कर
गली
उसकी
जान,
जाते
भी
तो
किधर
जाते
?
क़ैस
तो
दश्त
तक
भी
जा
निकले
"शाद"
तुम
रास्ते
में
मर
जाते
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Shaad Imran
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