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Sahil Verma
jo aish men daulat ye ज़ाया' hoti hai
jo aish men daulat ye ज़ाया' hoti hai | जो ऐश में दौलत ये ज़ाया' होती है
- Sahil Verma
जो
ऐश
में
दौलत
ये
ज़ाया'
होती
है
भगवान
की
ही
सब
ये
माया
होती
है
बेटी
नहीं
बन
सकती
है
बेटा
कभी
बेटी
तो
आख़िर
धन
पराया
होती
है
औलाद
बस
तब
तक
ही
रहती
है
सगी
माँ-बाप
की
जब
तक
भी
छाया
होती
है
अपने
ही
बच्चे
जो
न
पाले
ठीक
से
औरों
के
घर
की
अच्छी
आया
होती
है
तन
और
मन
जलता
है
तब
तक
धूप
से
जब
तक
न
उसकी
ज़ुल्फ़
साया
होती
है
- Sahil Verma
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चराग़
घर
का
हो
महफ़िल
का
हो
कि
मंदिर
का
हवा
के
पास
कोई
मसलहत
नहीं
होती
Waseem Barelvi
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हर
इक
सू
हैं
दर-ओ-दीवार
लेकिन
मुयस्सर
है
नहीं
घर-बार
लेकिन
Umrez Ali Haider
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लोग
कहते
हैं
कि
इस
खेल
में
सर
जाते
हैं
इश्क़
में
इतना
ख़सारा
है
तो
घर
जाते
हैं
Shakeel Jamali
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ज़मीं
पे
घर
बनाया
है
मगर
जन्नत
में
रहते
हैं
हमारी
ख़ुश-नसीबी
है
कि
हम
भारत
में
रहते
हैं
Mehshar Afridi
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इक
दिए
से
एक
कमरा
भी
बहुत
है
दिल
जलाने
से
ये
घर
रौशन
हुआ
है
Neeraj Neer
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रोज़
ढक
लेती
थी
नीला
जिस्म
अपना
शुक्र
है
आ
गई
बाहर
घर
की
बातें
Parul Singh "Noor"
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इसी
उम्मीद
से
मैं
देखता
हूँ
रास्ता
उसका
वो
आएगा
ज़मी
बंजर
में
इक
दिन
घर
उगाने
को
Kushal "PARINDA"
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मैं
ये
भी
चाहती
हूँ
तिरा
घर
बसा
रहे
और
ये
भी
चाहती
हूँ
कि
तू
अपने
घर
न
जाए
Rehana Roohi
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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उन
के
होने
से
बख़्त
होते
हैं
बाप
घर
के
दरख़्त
होते
हैं
Unknown
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जुदा
मुझ
सेे
तुझे
होने
नहीं
दूँगा
मैं
तेरा
प्यार
अब
खोने
नहीं
दूँगा
मैं
हँस
लूँगा
हमेशा
साथ
में
तेरे
मगर
तुझको
कभी
रोने
नहीं
दूँगा
जगह
तेरी
रहेगी
बीच
में
दिल
के
किसी
के
आने
से
कोने
नहीं
दूँगा
क़सम
तेरी,
तुझे
जो
भी
सताएगा
उसे
मैं
रात-भर
सोने
नहीं
दूँगा
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Sahil Verma
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मैं
तुम
सेे
बहुत
सुन्दर
दिखता
तो
नहीं
लेकिन
तुम
मेरी
तरह
इतने
अय्यार
नहीं
दिखते
Sahil Verma
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बाग़
की
चर्चा
बस
तब
तलक
होती
है
उसके
फूलों
में
जब
तक
महक
होती
है
Sahil Verma
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जब
पायलों
में
तेरी
छन-छन
होती
है
तब
जाके
भँवरों
में
से
गुंजन
होती
है
अक्सर
जो
तू
इक
धुन
सुना
करती
है
वो
मेरे
ही
दिल
की
एक
धड़कन
होती
है
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Sahil Verma
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जीतना
वश
में
है
नहीं
अपने
सीखना
यार
अपने
वश
में
है
कौन
कब
जीता
और
कब
हारा
मन
इसी
एक
कश्मकश
में
है
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Sahil Verma
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