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Sandeep dabral 'sendy'
loot li muskaan uski muflisi ne saste men
loot li muskaan uski muflisi ne saste men | लूट ली मुस्कान उसकी मुफ़लिसी ने सस्ते में
- Sandeep dabral 'sendy'
लूट
ली
मुस्कान
उसकी
मुफ़लिसी
ने
सस्ते
में
अब
किताबों
की
जगह
कुछ
बोलते
हैं
बस्ते
में
रोज़
चलकर
रस्सी
पर
करतब
दिखाने
पड़ते
हैं
जब
से
शामिल
है
हुआ
वो
मुफ़लिसी
के
दस्ते
में
- Sandeep dabral 'sendy'
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इसी
लिए
तो
है
ज़िंदाँ
को
जुस्तुजू
मेरी
कि
मुफ़लिसी
को
सिखाई
है
सर-कशी
मैं
ने
Ali Sardar Jafri
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लो
चाँद
हो
गया
नमू
माह-ए-ख़राम
का
ऐ
मोमिनों
लिबास-ए-सियाह
ज़ेब-ए-तन
करो
फ़र्श-ए-अज़ा
बिछा
के
अज़ाख़ाने
में
शजर
अब
सुब्ह-ओ-शाम
ज़िक्र-ए-ग़रीब-उल-वतन
करो
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Shajar Abbas
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गुज़ार
देते
हैं
रातें
पहलू
में
उसके
जुगनू
को
भी
दर
का
फ़क़ीर
बना
रखा
है
ALI ZUHRI
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सच
की
डगर
पे
जब
भी
रक्खे
क़दम
किसी
ने
पहले
तो
देखी
ग़ुर्बत
फिर
तख़्त-ओ-ताज
देखा
Amaan Pathan
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मुफ़लिसी
थी
और
हम
थे
घर
के
इकलौते
चराग़
वरना
ऐसी
रौशनी
करते
कि
दुनिया
देखती
Kashif Sayyed
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हज़ारों
साल
नर्गिस
अपनी
बे-नूरी
पे
रोती
है
बड़ी
मुश्किल
से
होता
है
चमन
में
दीदा-वर
पैदा
Allama Iqbal
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भूख
है
तो
सब्र
कर,
रोटी
नहीं
तो
क्या
हुआ
आजकल
दिल्ली
में
है
ज़ेर-ए-बहस
ये
मुद्दआ
Dushyant Kumar
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पराई
आग
पे
रोटी
नहीं
बनाऊँगा
मैं
भीग
जाऊँगा
छतरी
नहीं
बनाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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शराब
खींची
है
सब
ने
ग़रीब
के
ख़ूँ
से
तू
अब
अमीर
के
ख़ूँ
से
शराब
पैदा
कर
तू
इंक़लाब
की
आमद
का
इंतिज़ार
न
कर
जो
हो
सके
तो
अभी
इंक़लाब
पैदा
कर
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Asrar Ul Haq Majaz
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दफ़्तरी
से
तो
फ़क़त
रोटी
ही
चल
सकती
है
अपनी
साँसों
की
ख़ातिर
ज़रूरी
शा'इरी
करना
है
साहिब
Harsh saxena
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पहले
अलम
के
वास्ते
झूठी
हँसी
ईजाद
की
फिर
क़ल्ब
बहलाने
के
ख़ातिर
शा'इरी
ईजाद
की
मरना
पड़ा
इक
नइँ
हज़ारों
मर्तबा
याँ
जीते
जी
आख़िर
में
तब
जाके
यहाँ
ये
ख़ुद-कुशी
ईजाद
की
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Sandeep dabral 'sendy'
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है
देखने
लायक़
दुनिया
में
क्या
क्या
नइँ
लेकिन
मोबाइल
से
नज़र
हटे
तो
देखें
फिर
दुनिया
Sandeep dabral 'sendy'
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ख़ुशी
ख़ुशी
मैं
उसका
हो
जाता
लेकिन
जो
सबका
हो
जाए
उसका
क्या
होना
Sandeep dabral 'sendy'
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आँखों
से
आँसू
उनके
अब
आने
लगे
अल्फ़ाज़
उनको
अब
ज़रा
भाने
लगे
ग़ज़लों
में
मिलता
है
उन्हें
भी
अक़्स
सो
ग़ज़लें
मेरी
अब
ख़ूब
वो
गाने
लगे
मिलती
रही
लोगों
को
शाबाशी
मगर
हिस्से
हमारे
बस
यहाँ
ताने
लगे
पकड़ा
न
जाए
झूठ
उनका
भी
कहीं
सो
इसलिए
वो
हमको
समझाने
लगे
हम
भी
खड़े
थे
दीद
की
ख़ातिर
कभी
सो
रिश्ते
में
हम
उनके
दीवाने
लगे
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Sandeep dabral 'sendy'
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हम
जिसको
सोचा
करते
थे
हर
दिन
रात
मियाँ
लेकिन
वो
तो
किसी
और
के
ही
ख़्वाबों
की
ही
शहजादी
निकली
Sandeep dabral 'sendy'
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