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Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
koi ghar ghar bhi nahin hota hai aurat ke baghair
koi ghar ghar bhi nahin hota hai aurat ke baghair | कोई घर, घर भी नहीं होता है औरत के बग़ैर
- Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
कोई
घर,
घर
भी
नहीं
होता
है
औरत
के
बग़ैर
घर
को
जन्नत
भी
बना
सकती
है,
चाहे
वो
अगर
- Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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इसी
उम्मीद
से
मैं
देखता
हूँ
रास्ता
उसका
वो
आएगा
ज़मी
बंजर
में
इक
दिन
घर
उगाने
को
Kushal "PARINDA"
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उसे
अभी
भी
मेरे
दिल
के
हाल
का
नहीं
पता
तो
यानी
उसको
अपने
घर
का
रास्ता
नहीं
पता
ये
तेरी
भूल
है
ऐ
मेरे
ख़ुश-ख़याल
के
मुझे
पराई
औरतों
से
तेरा
राब्ता
नहीं
पता
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Ruqayyah Maalik
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ये
परिंदे
भी
खेतों
के
मज़दूर
हैं
लौट
के
अपने
घर
शाम
तक
जाएँगे
Bashir Badr
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उसके
इश्क़
में
बाल
बढ़ाने
वालों
सुन
लो
उसके
घर
वाले
तो
पैसा
देखेंगे
Shaad Imran
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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हमारे
घर
की
दीवारों
पे
'नासिर'
उदासी
बाल
खोले
सो
रही
है
Nasir Kazmi
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इक
दिए
से
एक
कमरा
भी
बहुत
है
दिल
जलाने
से
ये
घर
रौशन
हुआ
है
Neeraj Neer
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अजब
अंदाज़
से
ये
घर
गिरा
है
मिरा
मलबा
मिरे
ऊपर
गिरा
है
Aanis Moin
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लोग
हर
मोड़
पे
रुक
रुक
के
सँभलते
क्यूँँ
हैं
इतना
डरते
हैं
तो
फिर
घर
से
निकलते
क्यूँँ
हैं
मोड़
होता
है
जवानी
का
सँभलने
के
लिए
और
सब
लोग
यहीं
आ
के
फिसलते
क्यूँँ
हैं
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Rahat Indori
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जितने
मर्ज़ी
महँगे
पकवानों
को
खालो
तुम
घर
की
रोटी
तो
फिर
घर
की
रोटी
होती
है
Sarvjeet Singh
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ज़िंदगी
के
खाते
से
इक
साल
और
कम
हो
गया
है
और
बधाई
दे
रहे
हैं
लोग
इक
दूजे
को
इसकी
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गर्व
मुझको
क्यूँ
न
हो
ख़ुद
पर
भला
जन्म
क्षत्रिय
वंश
में
मैंने
लिया
नाम
है
संदीप
ग़ज़लों
में
शफ़क़
ग्राम
बड़दा
है
जहाँ
माँ
नर्मदा
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जो
ज़र,
फल
न
दे
पाए
वो
छांव
देंगे
न
काटो
दरख़्तों
को
आँगन
से
लोगों
वसीयत
को
रखते
हो
जैसे
सँभाले
सँभालो
दरख़्तों
को
भी
वैसे
लोगों
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Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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धोका
होना,
क़त्ल
होना
बाद
उसके
भी
बहुत
कुछ
अब
तुम्हें
हम
क्या
बताएँ
इश्क़
में
क्या
क्या
हुआ
है
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बात
कहनी
थी
ये
बस
उसी
का
हूँ
मैं
हर
घड़ी
याद
में
उसकी
रोता
हूँ
मैं
सुन
रही
हो
इसी
भीड़
में
वो
मुझे
बस
इसी
आस
में
गीत
गाता
हूँ
मैं
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