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Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
ik bala ae husn kya kya kar gaii
ik bala ae husn kya kya kar gaii | इक बला ए हुस्न क्या क्या कर गई
- Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
इक
बला
ए
हुस्न
क्या
क्या
कर
गई
बेरुखी
करके
जो
तन्हा
कर
गई
कम
मुहब्बत
और
ज़्यादा
कर
गई
भरते
ज़ख़्मों
को
भी
ताज़ा
कर
गई
फूल
तितली
ख़ास
थे
कितने
कभी
इक
नजर
में
सब
को
सादा
कर
गई
ख़्वाब
में
माशूका
सी
पेश
आती
थी
रूबरू
वो
ख़्वाब
झूठा
कर
गई
इतना
खारा
है
समुंदर
सरफिरा
इसको
छू
कर
कितना
मीठा
कर
गई
कुछ
कदम
तो
साथ
लेकर
भी
चली
मोड़
पर
आख़िर
में
चलता
कर
गई
हक
जताती
रह
गई
दुनिया
"शफ़क़"
चूमकर
वो
तुझको
जूठा
कर
गई
- Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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आँख
आँसू
को
ऐसे
रस्ता
देती
है
जैसे
रेत
गुज़रने
दरिया
देती
है
कोई
भी
उसको
जीत
नहीं
पाया
अब
तक
वैसे
वो
हर
एक
को
मौक़ा
देती
है
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Kafeel Rana
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बहुत
ग़ुरूर
है
दरिया
को
अपने
होने
पर
जो
मेरी
प्यास
से
उलझे
तो
धज्जियाँ
उड़
जाएँ
Rahat Indori
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आँसू
आँसू
जिस
ने
दरिया
पार
किए
क़तरा
क़तरा
आब
में
उलझा
बैठा
है
Mashkoor Husain Yaad
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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चलो
न
फिर
से
दरिया
के
नज़दीक
चलें
चलो
न
फिर
से
डुबकी
साथ
लगाएँगे
Atul K Rai
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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शदीद
प्यास
थी
फिर
भी
छुआ
न
पानी
को
मैं
देखता
रहा
दरिया
तिरी
रवानी
को
Shahryar
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रात
के
जिस्म
में
जब
पहला
पियाला
उतरा
दूर
दरिया
में
मेरे
चाँद
का
हाला
उतरा
Kumar Vishwas
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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दरिया
की
वुसअतों
से
उसे
नापते
नहीं
तन्हाई
कितनी
गहरी
है
इक
जाम
भर
के
देख
Adil Mansuri
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अगर
जो
साथ
है
तेरा,मुझे
किस
बात
की
चिंता
नसीबों
से
जो
है
मिलता,है
भाई
तू
वही
हीरा
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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इमारतों
से
शहर
भर
गया
है
अब
न
बच
सका
कोई
भी
इंसाँ
शहर
में
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जिस
तरह
से
निकाले
गए
आज
हम
दर्द
अपना
कहें
तो
किसे
आज
हम
ज़िंदगी
के
सिखाए
थे
मतलब
जिन्हें
क़त्ल
उनके
ही
हाथों
हुए
आज
हम
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Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
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अपने
हाथों
में
फिर
आज
उसने
रचाई
होगी
मेहंदी
आज
फिर
वो
राह
तकती
होगी,चाँद
आएगा
छत
पे
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अब
न
मिलना
"शफ़क़"
तू
भी
उस
सेे
वो
दगा
तुझ
सेे
करने
पर
भी
है
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