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Sahir Ludhianvi
dekha hai zindagi ko kuchh itne qareeb se
dekha hai zindagi ko kuchh itne qareeb se | देखा है ज़िन्दगी को कुछ इतने क़रीब से
- Sahir Ludhianvi
देखा
है
ज़िन्दगी
को
कुछ
इतने
क़रीब
से
चेहरे
तमाम
लगने
लगे
हैं
अजीब
से
- Sahir Ludhianvi
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मिरे
सलीक़े
से
मेरी
निभी
मोहब्बत
में
तमाम
उम्र
मैं
नाकामियों
से
काम
लिया
Meer Taqi Meer
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वो
एक
दिन
जो
तुझे
सोचने
में
गुज़रा
था
तमाम
उम्र
उसी
दिन
की
तर्जुमानी
है
Abhishek shukla
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तमाम
होश
ज़ब्त
इल्म
मस्लहत
के
बाद
भी
फिर
इक
ख़ता
मैं
कर
गया
था
माज़रत
के
बाद
भी
Pallav Mishra
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हुस्न
बला
का
क़ातिल
हो
पर
आख़िर
को
बेचारा
है
इश्क़
तो
वो
क़ातिल
जिसने
अपनों
को
भी
मारा
है
ये
धोखे
देता
आया
है
दिल
को
भी
दुनिया
को
भी
इसके
छल
ने
खार
किया
है
सहरा
में
लैला
को
भी
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Jaun Elia
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इश्क़
तिरी
इंतिहा
इश्क़
मिरी
इंतिहा
तू
भी
अभी
ना-तमाम
मैं
भी
अभी
ना-तमाम
Allama Iqbal
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न
जाने
ख़त्म
हुई
कब
हमारी
आज़ादी
तअल्लुक़ात
की
पाबंदियाँ
निभाते
हुए
Azhar Iqbal
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दिल-ए-नादाँ
तुझे
हुआ
क्या
है
आख़िर
इस
दर्द
की
दवा
क्या
है
Mirza Ghalib
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वो
आदमी
नहीं
है
मुकम्मल
बयान
है
माथे
पे
उस
के
चोट
का
गहरा
निशान
है
वो
कर
रहे
हैं
इश्क़
पे
संजीदा
गुफ़्तुगू
मैं
क्या
बताऊँ
मेरा
कहीं
और
ध्यान
है
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Dushyant Kumar
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देखो
तो
चश्म-ए-यार
की
जादू-निगाहियाँ
बेहोश
इक
नज़र
में
हुई
अंजुमन
तमाम
Hasrat Mohani
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जिस
दिन
तुम्हारे
ख़त
का
मुझे
इंतिज़ार
था
उस
दिन
तमाम
पंछी
कबूतर
लगे
मुझे
Ali Rumi
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ये
ज़ुल्फ़
अगर
खुल
के
बिखर
जाए
तो
अच्छा
इस
रात
की
तक़दीर
सँवर
जाए
तो
अच्छा
जिस
तरह
से
थोड़ी
सी
तिरे
साथ
कटी
है
बाक़ी
भी
उसी
तरह
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
दुनिया
की
निगाहों
में
भला
क्या
है
बुरा
क्या
ये
बोझ
अगर
दिल
से
उतर
जाए
तो
अच्छा
वैसे
तो
तुम्हीं
ने
मुझे
बर्बाद
किया
है
इल्ज़ाम
किसी
और
के
सर
जाए
तो
अच्छा
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Sahir Ludhianvi
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उन
के
रुख़्सार
पे
ढलके
हुए
आँसू
तौबा
मैंने
शबनम
को
भी
शोलों
पे
मचलते
देखा
Sahir Ludhianvi
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देखा
है
ज़िंदगी
को
कुछ
इतने
क़रीब
से
चेहरे
तमाम
लगने
लगे
हैं
अजीब
से
ऐ
रूह-ए-अस्र
जाग
कहाँ
सो
रही
है
तू
आवाज़
दे
रहे
हैं
पयम्बर
सलीब
से
इस
रेंगती
हयात
का
कब
तक
उठाएँ
बार
बीमार
अब
उलझने
लगे
हैं
तबीब
से
हर
गाम
पर
है
मजमा-ए-उश्शाक़
मुंतज़िर
मक़्तल
की
राह
मिलती
है
कू-ए-हबीब
से
इस
तरह
ज़िंदगी
ने
दिया
है
हमारा
साथ
जैसे
कोई
निबाह
रहा
हो
रक़ीब
से
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Sahir Ludhianvi
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मेरे
ख़्वाबों
में
भी
तू
मेरे
ख़यालों
में
भी
तू
कौन
सी
चीज़
तुझे
तुझ
से
जुदा
पेश
करूँँ
Sahir Ludhianvi
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तंग
आ
चुके
हैं
कशमकश-ए-ज़िंदगी
से
हम
ठुकरा
न
दें
जहाँ
को
कहीं
बे-दिली
से
हम
Sahir Ludhianvi
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