manzil pe pahunchne ka mujhe shauq hua tez | मंज़िल पे पहुँचने का मुझे शौक़ हुआ तेज़

  - Saba Akbarabadi
मंज़िलपेपहुँचनेकामुझेशौक़हुआतेज़
रस्तामिलादुश्वारतोमैंऔरचलातेज़
हाथोंकोडुबोआएहोतुमकिसकेलहूमें
पहलेतोकभीइतनाथारंग-ए-हिनातेज़
मुझकोयेनदामतहैकिमैंसख़्त-गुलूथा
तुझसेयेशिकायतहैकिख़ंजरकियातेज़
चलमैंतुझेरफ़्तारकाअंदाज़सिखादूँ
हम-राहमिरेसुस्त-क़दममुझसेजुदातेज़
अफ़्सुर्दगी-ए-गुलपेभरींकिसनेयेआहें
चलतीहैसर-ए-सहन-ए-चमनआजहवातेज़
अबमुझकोनज़रफेरकेइकजामदेसाक़ी
फिरकौनसँभालेगाअगरनश्शाहुआतेज़
इंसानकेहरग़मपे'सबा'चोटलगीहै
शीशेकेचटख़नेकीभीथीकितनीसदातेज़
  - Saba Akbarabadi
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