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Rajendra Krishan
is bharii duniya men koi bhi hamaara na hua
is bharii duniya men koi bhi hamaara na hua | इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ
- Rajendra Krishan
इस
भरी
दुनिया
में
कोई
भी
हमारा
न
हुआ
ग़ैर
तो
ग़ैर
हैं
अपनों
का
सहारा
न
हुआ
लोग
रो
रो
के
भी
इस
दुनिया
में
जी
लेते
हैं
एक
हम
हैं
कि
हँसे
भी
तो
गुज़ारा
न
हुआ
इक
मोहब्बत
के
सिवा
और
न
कुछ
माँगा
था
क्या
करें
ये
भी
ज़माने
को
गवारा
न
हुआ
आसमाँ
जितने
सितारे
हैं
तिरी
महफ़िल
में
अपनी
तक़दीर
का
ही
कोई
सितारा
न
हुआ
- Rajendra Krishan
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कभी
मैं
अपने
हाथों
की
लकीरों
से
नहीं
उलझा
मुझे
मालूम
है
क़िस्मत
का
लिक्खा
भी
बदलता
है
Bashir Badr
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घर
से
निकले
हुए
बेटों
का
मुक़द्दर
मालूम
माँ
के
क़दमों
में
भी
जन्नत
नहीं
मिलने
वाली
Iftikhar Arif
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मिलना
था
इत्तिफ़ाक़
बिछड़ना
नसीब
था
वो
उतनी
दूर
हो
गया
जितना
क़रीब
था
Anjum Rehbar
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तदबीर
के
दस्त-ए-रंगीं
से
तक़दीर
दरख़्शाँ
होती
है
क़ुदरत
भी
मदद
फ़रमाती
है
जब
कोशिश-ए-इंसाँ
होती
है
Hafeez Banarasi
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इस
बेवफ़ाई
पर
मुझे
हैरत
नहीं
तुझको
पा
लूँ
ऐसी
मिरी
क़िस्मत
नहीं
Harsh saxena
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हुस्न
को
भी
कहाँ
नसीब
'जिगर'
वो
जो
इक
शय
मिरी
निगाह
में
है
Jigar Moradabadi
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पलटा
दे
तक़दीर
हमारी
आकर
माथा
चूम
हमारा
Siddharth Saaz
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ये
कब
कहते
हैं
कि
आकर
हमको
गले
लगा
ले
वो
मिल
जाए
तो
रस्मन
ही
बस
हाथ
मिला
ले
काफ़ी
है
इतने
कहाँ
नसीब
कि
इस
सेे
प्यास
बुझाएँ
खेल
करें
दरिया
हम
जैसों
को
अपने
पास
बिठा
ले
काफ़ी
है
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Vashu Pandey
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जिन
की
दर्द-भरी
बातों
से
एक
ज़माना
राम
हुआ
'क़ासिर'
ऐसे
फ़न-कारों
की
क़िस्मत
में
बन-बास
रहा
Ghulam Mohammad Qasir
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मैं
उन्हीं
आबादियों
में
जी
रहा
होता
कहीं
तुम
अगर
हँसते
नहीं
उस
दिन
मेरी
तक़दीर
पर
Zia Mazkoor
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किसी
की
याद
में
दुनिया
को
हैं
भुलाए
हुए
ज़माना
गुज़रा
है
अपना
ख़याल
आए
हुए
बड़ी
अजीब
ख़ुशी
है
ग़म-ए-मोहब्बत
भी
हँसी
लबों
पे
मगर
दिल
पे
चोट
खाए
हुए
हज़ार
पर्दे
हों
पहरे
हों
या
हों
दीवारें
रहेंगे
मेरी
नज़र
में
तो
वो
समाए
हुए
किसी
के
हुस्न
की
बस
इक
किरन
ही
काफ़ी
है
ये
लोग
क्यूँँ
मिरे
आगे
हैं
शम्अ'
लाए
हुए
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Rajendra Krishan
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