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Atul K Rai
prashn chash
prashn chash | प्रश्न चश्में पर खड़ा कर दे रही
- Atul K Rai
प्रश्न
चश्में
पर
खड़ा
कर
दे
रही
आपकी
मौजूदगी
भी
ख़ूब
है
- Atul K Rai
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बंद
कमरे
में
हज़ारों
मील
अब
चलते
हैं
हम
काफ़ी
महँगी
पड़
रही
है
शा'इरी
से
दोस्ती
Ashraf Jahangeer
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अब
उसकी
शादी
का
क़िस्सा
न
छेड़ो
बस
इतना
कह
दो
कैसी
लग
रही
थी
Zubair Ali Tabish
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दिल
की
तमन्ना
थी
मस्ती
में
मंज़िल
से
भी
दूर
निकलते
अपना
भी
कोई
साथी
होता
हम
भी
बहकते
चलते
चलते
Majrooh Sultanpuri
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बर्बाद
कर
दिया
हमें
परदेस
ने
मगर
माँ
सब
से
कह
रही
है
कि
बेटा
मज़े
में
है
Munawwar Rana
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जब
भी
कोई
मंज़िल
हासिल
करता
हूँ
याद
बहुत
आती
हैं
तेरी
ता'रीफ़ें
Tanoj Dadhich
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मुक़र्रर
दिन
नहीं
तो
लम्हा-ए-इमकान
में
आओ
अगर
तुम
मिल
नहीं
सकती
तो
मेरे
ध्यान
में
आओ
बला
की
ख़ूब-सूरत
लग
रही
हो
आज
तो
जानाँ
मुझे
इक
बात
कहनी
थी
तुम्हारे
कान
में..
आओ
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Darpan
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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सिवा
इसके
कुछ
अच्छा
ही
नहीं
लगता
है
शामों
में
सफ़र
कैसा
भी
हो
घर
को
परिंदे
लौट
जाते
हैं
Aarush Sarkaar
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न
जाने
कैसी
महक
आ
रही
है
बस्ती
से
वही
जो
दूध
उबलने
के
बाद
आती
है
Munawwar Rana
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उन्हीं
रास्तों
ने
जिन
पर
कभी
तुम
थे
साथ
मेरे
मुझे
रोक
रोक
पूछा
तिरा
हम-सफ़र
कहाँ
है
Bashir Badr
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छाता
उड़
जाता
है
पहली
बारिश
में
पहली
बारिश
पहली
बारिश
होती
है
Atul K Rai
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आप
ही
कहते
थे
सस्ता
खोजिए
आप
ही
अब
यार
अच्छा
खोजिए
जो
मुहब्बत
करके
भी
आबाद
हों
एक
लड़की
और
लड़का
खोजिए
वरना
रह
जाएंँगे
चक्कर
काटते
केंद्र
तक
जाने
का
रस्ता
खोजिए
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Atul K Rai
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जिसे
मंज़िल
बताया
जा
रहा
था
वो
रस्ते
के
सिवा
कुछ
भी
नहीं
है
Atul K Rai
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ज़माना
ग़ौर
से
सुनता
है
उनको
मुखर
जो
मौन
होना
जानते
हैं
Atul K Rai
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वही
होगा
दुबारा
हश्र
मेरा
वही
आँखें
दुबारा
सामने
हैं
Atul K Rai
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