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Atul K Rai
koi kandha nahin hai rone ko
koi kandha nahin hai rone ko | कोई कन्धा नहीं है रोने को
- Atul K Rai
कोई
कन्धा
नहीं
है
रोने
को
आग
लग
जाए
इस
कमाई
में
- Atul K Rai
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जो
यहाँ
ख़ुद
ही
लगा
रक्खी
है
चारों
जानिब
एक
दिन
हम
ने
इसी
आग
में
जल
जाना
है
Zafar Iqbal
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जब
सर-ए-शाम
पजीराई-ए-फ़न
होती
है
शाहज़ादी
को
कनीज़ों
से
जलन
होती
है
ले
तो
आया
हूँ
तुझे
घेर
के
अपनी
जानिब
आगे
इंसान
की
अपनी
भी
लगन
होती
है
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Azhar Faragh
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हो
न
हो
एक
ही
तस्वीर
के
दो
पहलू
हैं
रक़्स
करता
हुआ
तू
आग
में
जलता
हुआ
मैं
Shahid Zaki
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पास
हमारे
आकर
वो
शर्माती
है
तब
जाकर
के
एक
ग़ज़ल
हो
पाती
है
उसको
छूना
छोटा
मोटा
खेल
नहीं
गर्मी
क्या
सर्दी
में
लू
लग
जाती
है
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Tanoj Dadhich
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कभी
इश्क़
करो
और
फिर
देखो
इस
आग
में
जलते
रहने
से
कभी
दिल
पर
आँच
नहीं
आती
कभी
रंग
ख़राब
नहीं
होता
Saleem Kausar
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उस
से
कहना
की
धुआँ
देखने
लाएक़
होगा
आग
पहने
हुए
मैं
जाऊँगा
पानी
की
तरफ़
Abhishek shukla
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तारीकियों
को
आग
लगे
और
दिया
जले
ये
रात
बैन
करती
रहे
और
दिया
जले
उस
की
ज़बाँ
में
इतना
असर
है
कि
निस्फ़
शब
वो
रौशनी
की
बात
करे
और
दिया
जले
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Tehzeeb Hafi
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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पेड़
का
दुख
तो
कोई
पूछने
वाला
ही
न
था
अपनी
ही
आग
में
जलता
हुआ
साया
देखा
Jameel Malik
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इक
बर्फ़
सी
जमी
रहे
दीवार-ओ-बाम
पर
इक
आग
मेरे
कमरे
के
अंदर
लगी
रहे
Salim Saleem
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अभी
सीने
पे
मुक्का
मार
कर
रोने
का
क्या
मतलब
लगा
लेते
जो
कल
सीने
से
ये
नौबत
नहीं
आती
Atul K Rai
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गिनाऊँ
क्या
सभी
हथियार
छोड़ो
तुम्हारी
आँख
का
काजल
बहुत
है
Atul K Rai
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एक
झटके
में
हरा
देता
है
वो
डाँटने
पर
मुस्करा
देता
है
वो
तुम
अकेले
ही
नहीं
जो
मिट
गए
रोज़
लिखता
है
मिटा
देता
है
वो
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Atul K Rai
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ज़रा
सा
भर
गए
क्या
देखिए
ना
घड़े
झगड़ा
नदी
से
कर
रहे
हैं
Atul K Rai
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लगा
दो
अब
किनारे
नाव
या
फिर
भँवर
पैदा
करो
यह
डूब
जाए
Atul K Rai
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