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Atul K Rai
dhara ka skhalan bhari padega
dhara ka skhalan bhari padega | धरा का स्खलन भारी पड़ेगा
- Atul K Rai
धरा
का
स्खलन
भारी
पड़ेगा
सुनो
यह
उत्खनन
भारी
पड़ेगा
समुंदर
का
अभी
गौना
हुआ
है
किनारे
पर
मिलन
भारी
पड़ेगा
कहाँ
तुम
गोपियों
को
जानते
थे
कहा
था
ना
गमन
भारी
पड़ेगा
चले
जाना
नियति
है
मान
लो
अब
चले
जाओ
वरन
भारी
पड़ेगा
पुराने
दिन
पुनः
अँखुआ
रहे
हैं
नये
दिन
का
सृजन
भारी
पड़ेगा
अभी
तो
शेष
है
गहनों
की
थिरकन
बिना
गहना
बदन
भारी
पड़ेगा
अतुल
तुम
ढीठ
होते
जा
रहे
हो
गुलाबी
यह
व्यसन
भारी
पड़ेगा
- Atul K Rai
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कोई
कहता
था
समुंदर
हूँ
मैं
और
मिरी
जेब
में
क़तरा
भी
नहीं
Kaifi Azmi
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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बातचीत
में
आला
हो
बस
ठीक
न
हो
फ़ाइदा
क्या
महबूब
अगर
बारीक
न
हो
हम
तेरी
क़ुर्बत
में
अक्सर
सोचते
हैं
दरिया
खेत
के
इतना
भी
नज़दीक
न
हो
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Khurram Afaq
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ये
आग
वाग
का
दरिया
तो
खेल
था
हम
को
जो
सच
कहें
तो
बड़ा
इम्तिहान
आँसू
हैं
Abhishek shukla
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बहरस
ख़ारिज
हूँ
ये
मालूम
है
पर
तुम्हारी
ही
ग़ज़ल
का
शे'र
हूँ
Gyan Prakash Akul
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मुतअस्सिर
हैं
यहाँ
सब
लोग
जाने
क्या
समझते
हैं
नहीं
जो
यार
शबनम
भी
उसे
दरिया
समझते
हैं
हक़ीक़त
सारी
तेरी
मैं
बता
तो
दूँ
सर-ए-महफ़िल
मगर
ये
लोग
सारे
जो
तुझे
अच्छा
समझते
हैं
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Nirvesh Navodayan
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तुमको
हम
ही
झूठ
लगेंगे
लेकिन
दरिया
झूठा
है
पहले
हमको
चाँद
मिला
था
फिर
दरिया
को
चाँद
मिला
Abhishar Geeta Shukla
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मेरे
जुनूँ
का
नतीजा
ज़रूर
निकलेगा
इसी
सियाह
समुंदर
से
नूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
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बहुत
ग़ुरूर
है
दरिया
को
अपने
होने
पर
जो
मेरी
प्यास
से
उलझे
तो
धज्जियाँ
उड़
जाएँ
Rahat Indori
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ज़िन्दगी
पर
लिख
दिया
था
नाम
मैंने
राम
का
और
फिर
दुख
के
समुंदर
पार
सारे
हो
गए
Tanoj Dadhich
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दुनिया
ने
तो
सीधे
सीधे
पागल
बोल
दिया
पढ़
कर
मेरे
माथे
पर
जो
लिक्खा
है
पढ़
पाओगी
लड़की
कल
भी
देखा
अब
भी
देख
रहे
हैं
कल
भी
देखेंगे
कितने
रोज़
बहानों
से
बस
काम
चलाओगी
लड़की
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Atul K Rai
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जनवरी
की
भाँति
आना
है
यहाँ
बीत
जाना
है
दिसम्बर
की
तरह
Atul K Rai
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झूठा
है
सच्चा
भी
तो
हो
सकता
है
चश्मा
है
गन्दा
भी
तो
हो
सकता
है
बारिश
केवल
बादल
की
मजबूरी
है
बादल
का
ग़ुस्सा
भी
तो
हो
सकता
है
हो
सकता
है
दीवालों
में
सीड़न
हो
आँगन
पर
अच्छा
भी
तो
हो
सकता
है
आँसू
पोंछ
रही
मुफ़लिस
की
उम्मीदें
महँगा
कल
सस्ता
भी
तो
हो
सकता
है
हो
सकता
है
ऊब
गई
हो
मंज़िल
भी
झगड़ा
इक
रस्ता
भी
तो
हो
सकता
है
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Atul K Rai
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धरा
को
तृप्त
करता
है
गरजता
ही
नहीं
बादल
चले
आओ
बरसकर
आत्मा
को
तृप्त
कर
दो
तुम
Atul K Rai
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जिसके
होने
से
लगे
जैसे
कि
दुनिया
मिल
गई
हर
किसी
के
पास
ऐसा
शख़्स
होना
चाहिए
Atul K Rai
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