jab apni zaat ko samjha to koi dar na raha | जब अपनी ज़ात को समझा तो कोई डर न रहा

  - Rafi Badayuni
जबअपनीज़ातकोसमझातोकोईडररहा
जहाँमेंकोईपरस्तार-ए-अहल-ए-ज़ररहा
सड़ककेकाँटेकिजिनपरलहूकेछींटेहैं
बतारहेहैंकिइकशख़्सरातघररहा
बदलतीक़द्रोंमेंख़ून-ए-जिगरसेनामा-ए-शौक़
येख़ासतर्ज़-ए-निगारिशभीमो'तबररहा
निगाह-ए-नाज़हैमायूसकिसतरफ़जाए
वोअहल-ए-दिलरहेहल्क़ा-ए-असररहा
ख़ुशीकेलम्होंसेकैफ़-ए-दवामक्यामिलता
वोरक़्स-ए-जामभीदेखाजोरातभररहा
लचकथीजिनमेंवोपौदेतोअबभीबाक़ीहैं
हवाकीज़दपेजोआयावहीशजररहा
ज़रासीदेरमेंमंज़िलकोपालियाउसने
वोजिसकेसरपेकहींसाया-ए-शजररहा
ख़िरदकादिलसेतअ'ल्लुक़कोईरिश्ताहै
वोहम-ख़यालभीकबथाजोहम-सफ़ररहा
  - Rafi Badayuni
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