kisi ke dast-e-talab ko pukaarta hooñ main | किसी के दस्त-ए-तलब को पुकारता हूँ मैं

  - Qamar Siddiqi
किसीकेदस्त-ए-तलबकोपुकारताहूँमैं
उठाओहाथमुझेमाँगलोदु'आहूँमैं
मिरेअज़लऔरअबदमेंनहींहैफ़स्लकोई
अभीशुरूअ'अभीख़त्महोगयाहूँमैं
बसीहैमुझमेंयुगोंसेअजीबवीरानी
बदनसेरूहतलकबे-कराँख़लाहूँमैं
कोईआगहैमुझमेंरौशनीधुआँ
किसीकेख़्वाबमेंजलताहुआदियाहूँमैं
नज़रकेवास्तेअपनानज़ाराकाफ़ीहै
ख़ुदअपनाअक्सहूँख़ुदअपनाआईनाहूँमैं
भटकरहाहूँमैंबे-अंतशाह-राहोंपर
तुम्हारेशहरमेंबिल्कुलनयानयाहूँमैं
  - Qamar Siddiqi
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