ruka na gham ka jo sail-e-ravaan to kya hogaa | रुका न ग़म का जो सैल-ए-रवाँ तो क्या होगा

  - Qamar Rais Bahraichi
रुकाग़मकाजोसैल-ए-रवाँतोक्याहोगा
उठाबदनसेअगरचेधुआँतोक्याहोगा
दयार-ए-इश्क़मेंआनेकोतोजाऊँमगर
मिलाआपकानाम-ओ-निशाँतोक्याहोगा
उतररहेहैंफ़लकसेहयातकेजुगनू
जुनूँमेंढलगएवहम-ओ-गुमाँतोक्याहोगा
लिबास-ए-नौमेंहैगुलशनकाहरशजरलेकिन
अगरख़िज़ाँनेलियाइम्तिहाँतोक्याहोगा
ज़बाँपेपहराख़िरदनेलगादियाहैमगर
लहूनेदेदियाअपनाबयाँतोक्याहोगा
बदनकोआइनातुमनेबनालियातोक्या
किसीनेखोलदीअपनीज़बाँतोक्याहोगा
अभीनिहाँहैहरइकज़ख़्म-ए-दिललहूमें'क़मर'
महकउठाजोयेज़ख़्म-ए-निहाँतोक्याहोगा
  - Qamar Rais Bahraichi
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