uthne men dard-e-muttasil hooñ main | उठने में दर्द-ए-मुत्तसिल हूँ मैं

  - Qalaq Merathi
उठनेमेंदर्द-ए-मुत्तसिलहूँमैं
गर्द-बाद-ए-ग़ुबार-ए-दिलहूँमैं
काबेतकसाथआयाशौक़-ए-सनम
हाएबुत-ख़ानाक्याख़जिलहूँमैं
हैफ़किसमुद्दईकीजाँहैतू
हाएकिसआश्नाकादिलहूँमैं
तुझकोदूँक्याजवाबदावर
अपनेहीआपमुन्फ़इलहूँमैं
तेरीनाज़ुकतनीपेग़ौरकी
अपनीउम्मीदसेख़जिलहूँमैं
हिलाउसकेदरसेता-महशर
मरक़द-ए-आरज़ूकीसिलहूँमें
ख़ाक-ए-हस्तीकीगर्द-बादहैतू
आतिश-ए-दिलकीआब-ओ-गिलहूँमैं
हदनहींकोईअपनीहालतकी
किनिगाहोंमेंमुंतक़िलहूँमैं
छागयायेतसव्वुरउसबुतका
नक़्श-ए-चींऔरबुत-ए-चगिलहूँमैं
ज़र्रासीज़िंदगीपहाड़हुई
आँखकाअपनीआपतिलहूँमैं
'क़लक़'क्यूँँकिछोड़दूँवहशत
वज़्अ'मेंअपनीमुस्तक़िलहूँमैं
  - Qalaq Merathi
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy