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pankaj pundir
tanhaa rahna aur KHush rahna saza kaafi nahin
tanhaa rahna aur KHush rahna saza kaafi nahin | तन्हा रहना और ख़ुश रहना, सज़ा काफ़ी नहीं
- pankaj pundir
तन्हा
रहना
और
ख़ुश
रहना,
सज़ा
काफ़ी
नहीं
तय
हुआ
वक़तन-फ़वक़तन
सामने
भी
आना
है
- pankaj pundir
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आधी
आधी
रात
तक
सड़कों
के
चक्कर
काटिए
शा'इरी
भी
इक
सज़ा
है
ज़िंदगी
भर
काटिए
कोई
तो
हो
जिस
से
उस
ज़ालिम
की
बातें
कीजिए
चौदहवीं
का
चाँद
हो
तो
रात
छत
पर
काटिए
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Nisar Nasik
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सज़ा
कितनी
बड़ी
है
गाँव
से
बाहर
निकलने
की
मैं
मिट्टी
गूँधता
था
अब
डबलरोटी
बनाता
हूँ
Munawwar Rana
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आरज़ू'
जाम
लो
झिजक
कैसी
पी
लो
और
दहशत-ए-गुनाह
गई
Arzoo Lakhnavi
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ये
जब्र
भी
देखा
है
तारीख़
की
नज़रों
ने
लम्हों
ने
ख़ता
की
थी
सदियों
ने
सज़ा
पाई
Muzaffar Razmi
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ख़ुद-कुशी
जुर्म
भी
है
सब्र
की
तौहीन
भी
है
इस
लिए
इश्क़
में
मर
मर
के
जिया
जाता
है
Ibrat Siddiqui
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यूँँ
ज़िंदगी
गुज़ार
रहा
हूँ
तिरे
बग़ैर
जैसे
कोई
गुनाह
किए
जा
रहा
हूँ
मैं
Jigar Moradabadi
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वो
रातों-रात
'सिरी-कृष्ण'
को
उठाए
हुए
बला
की
क़ैद
से
'बसदेव'
का
निकल
जाना
Firaq Gorakhpuri
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सज़ा
सच
बोलने
की
यह
मिली
है
सभी
ने
कर
लिया
हम
से
किनारा
Meem Alif Shaz
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तेरी
आँखों
के
लिए
इतनी
सज़ा
काफ़ी
है
आज
की
रात
मुझे
ख़्वाब
में
रोता
हुआ
देख
Abhishek shukla
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मसाइल
तो
बहुत
से
हैं
मगर
बस
एक
ही
हल
है
सहरस
शाम
तक
सर
मेरा
है
बेगम
की
चप्पल
है
मेरे
मालिक
भला
इस
सेे
बुरी
भी
क्या
सज़ा
होगी
मेरा
शादीशुदा
होना
ही
दोज़ख़
की
रिहर्सल
है
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Paplu Lucknawi
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हुई
शाम
मेरे
गले
लग
गया
ये
दिन-भर
का
जैसे
थका-हारा
दिन
pankaj pundir
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हो
गई
शाम
थोड़ी
सी
बासी
हम
पे
जँचने
लगी
है
उदासी
इक
ज़रा
दुनिया
में
सारी
दुनिया
सारी
दुनिया
में
दुनिया
ज़रा
सी
मसअला
है
कोई
जो
ये
बारिश
सुब्ह
से
बस
बरसती
है
प्यासी
एक
ही
शख़्स
से
सारी
उम्मीद
एक
ही
शख़्स
वो
भी
सियासी
हम
निभाए
गए
हिज्र-ए-आदाब
बे-हिसी
बे-दिली
बद-हवा
सेी
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pankaj pundir
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चर्ख़
मेरी
प्यास
से
वाक़िफ़
हुआ
धूप
ने
सहरा
पे
दरिया
लिख
दिया
pankaj pundir
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तुझ
सेे
कोई
शे'र
कह
दूँ,
हर्ज
क्या
है
मुझको
ये
मालूम
है
बस,
ज़ाया'
होगा
pankaj pundir
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बस
हाल
रूका
और
दौड़
गया
फिर
वक़्त
उसी
हाल
छोड़
गया
आख़िर
सो
गया
बाग़बाँ
मेरा
आख़िर
मुझे
फिर
कोई
तोड़
गया
घर
लौट
जाना
था
जहाँ
से
हमें
इस
रास्ते
का
ऐसा
मोड़
गया
किस
दर्जा
बिखर
के
सुकूँ
से
था
अब
फिर
से
मुझे
कौन
जोड़
गया
संजीदगी
में
रात
भर
जो
हुआ
मैं
सुब्ह
वही
हाल
ओढ़
गया
हम
तो
खिज़ाँ
के
फूल
थे,
बता
ना
क्यूँँ
हमको
बहारों
में
छोड़
गया
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pankaj pundir
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