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Piyush Nishchal
main shahar se tere nikal kar apni bastii jaaunga
main shahar se tere nikal kar apni bastii jaaunga | मैं शहरस तेरे निकल कर अपनी बस्ती जाउँगा
- Piyush Nishchal
मैं
शहरस
तेरे
निकल
कर
अपनी
बस्ती
जाउँगा
मैं
जाउँगा
मौजूदगी
में
तेरी
जल्दी
जाउँगा
मैं
जो
तुम्हारी
हर
अज़िय्यत
सह
के
अब
तक
ज़िंदा
हूँ
जिस
दिन
गले
से
तुम
लगाओगी
मैं
मर
ही
जाउँगा
- Piyush Nishchal
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उसी
का
शहर
वही
मुद्दई
वही
मुंसिफ़
हमें
यक़ीं
था
हमारा
क़ुसूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
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आदत
सी
बना
ली
है
तुमने
तो
'मुनीर'
अपनी
जिस
शहर
में
भी
रहना
उकताए
हुए
रहना
Muneer Niyazi
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हम
को
दिल
से
भी
निकाला
गया
फिर
शहरस
भी
हम
को
पत्थर
से
भी
मारा
गया
फिर
ज़हरस
भी
Azm Shakri
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ये
दिल
मलूल
भी
कम
है
उदास
भी
कम
है
कई
दिनों
से
कोई
आस
पास
भी
कम
है
हमें
भी
यूँं
ही
गुजरना
पसंद
है
और
फिर
तुम्हारा
शहर
मुसाफ़िर-शनास
भी
कम
है
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Farhat Abbas Shah
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हमने
पर्चे
आँसुओं
से
भर
दिए
और
तुमने
इतने
कम
नंबर
दिए
ऊंचे
नीचे
घर
थे
बस्ती
में
बहुत
जलजले
ने
सब
बराबर
कर
दिए
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Zubair Ali Tabish
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अब
के
सावन
में
शरारत
ये
मिरे
साथ
हुई
मेरा
घर
छोड़
के
कुल
शहर
में
बरसात
हुई
Gopaldas Neeraj
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लाज़िम
है
अब
कि
आप
ज़ियादा
उदास
हों
इस
शहर
में
बचे
हैं
बहुत
कम
उदास
लोग
Bhaskar Shukla
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शहर-वालों
की
मोहब्बत
का
मैं
क़ायल
हूँ
मगर
मैंने
जिस
हाथ
को
चूमा
वही
ख़ंजर
निकला
Ahmad Faraz
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इस
दौर-ए-सियासत
का
इतना
सा
फ़साना
है
बस्ती
भी
जलानी
है
मातम
भी
मनाना
है
Unknown
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नई
नई
आँखें
हों
तो
हर
मंज़र
अच्छा
लगता
है
कुछ
दिन
शहर
में
घू
में
लेकिन
अब
घर
अच्छा
लगता
है
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Nida Fazli
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ग़ज़ल
लिखनी
है
या
फिर
ख़्वाब
लिखना
है
कहो
किसको
यहाँ
महताब
लिखना
है
किया
था
ज़िक्र
तेरी
नजरों
का
लेकिन
तिरे
बोसे
को
अब
नायाब
लिखना
है
नहीं
लिखना
मुझे
तेरी
ख़ुशी
को
अब
मिरे
ग़म
को
मुझे
सैलाब
लिखना
है
मुहब्बत
को
समुंदर
था
लिखा
लेकिन
तिरी
नीयत
को
अब
तालाब
लिखना
है
नहीं
मालूम
लेकिन
कह
रहे
हैं
सब
मुझे
'पीयूष'
को
अहबाब
लिखना
है
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Piyush Nishchal
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मुहब्बत,
वस्ल,
नफ़रत,
हिज्र,
रेहलत
सब
मिले
हैं
तो
मैं
जाकर
अब
मुकम्मल
हूँ
Piyush Nishchal
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होंठ
को
दाँत
से
तू
दबाया
न
कर
फूल
पे
कौन
रखता
है
ख़ंजर
भला
Piyush Nishchal
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साथ
रख
कर
ये
मुहब्बत
अपनी
अपनी
जी
रहे
हैं
लोग
सब
बर्बादी
अपनी
इक
ज़रा
सा
रास्ता
क्या
माँगा
उस
सेे
उसने
तो
सारी
इमारत
ढा
दी
अपनी
आदमी
वो
तो
ज़ियादा
मतलबी
है
जो
दिखाता
फिरता
है
अच्छाई
अपनी
पास
मेरे
तुम
तो
आने
से
रहे
सो
आज
कल
में
मौत
ही
है
आनी
अपनी
इश्क़
में
आबाद
होना
था
मुझे
पर
हिज्र
में
ही
ख़ाक
है
बरनाई
अपनी
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Piyush Nishchal
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यक़ीं
मानो
कि
वो
अब
भी
मुहब्बत
करती
है
मुझ
सेे
यक़ीं
ये
भी
करो
यारा
कि
मैं
अब
झूठ
कहता
हूँ
Piyush Nishchal
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