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Parveen Kaif
ghoont paani ke sondhe sondhe the
ghoont paani ke sondhe sondhe the | घूँट पानी के सोंधे सोंधे थे
- Parveen Kaif
घूँट
पानी
के
सोंधे
सोंधे
थे
जब
वो
मिट्टी
के
आब-ख़ोरे
थे
आँच
भी
ख़ुश-गवार
देते
थे
कल
जो
वो
धी
में
धी
में
चूल्हे
थे
डाल
से
कैरियाँ
जो
गिरती
थीं
पाल
में
कच्चे
आम
पकते
थे
सर
उठा
कर
इमारतों
ने
कहा
वो
कोई
घर
थे
या
घरौंदे
थे
हाए
'परवीन'
ये
जदीद
फ़्लैट
इन
से
अच्छे
तो
कल
के
दड़बे
थे
- Parveen Kaif
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पेड़
का
दुख
तो
कोई
पूछने
वाला
ही
न
था
अपनी
ही
आग
में
जलता
हुआ
साया
देखा
Jameel Malik
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चले
जाओ
मगर
इतनी
मदद
करते
हुए
जाओ
मैं
तन्हा
मर
न
जाऊँ
दो
अदद
करते
हुए
जाओ
चराग़ों
की
जलन
से
ख़त्म
हो
जाती
है
तारीक़ी
हसद
करते
हुए
आओ
हसद
करते
हुए
जाओ
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Muzdum Khan
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पुराने
ख़तों
को
जला
देने
से
गर
मुहब्बत
जले
आग
मैं
भी
लगाऊँ
Bhoomi Srivastava
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मैं
आ
रहा
हूँ
अभी
चूम
कर
बदन
उस
का
सुना
था
आग
पे
बोसा
रक़म
नहीं
होता
Shanawar Ishaq
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तेरी
आँखों
में
जो
इक
क़तरा
छुपा
है,
मैं
हूँ
जिसने
छुप
छुप
के
तेरा
दर्द
सहा
है,
मैं
हूँ
एक
पत्थर
कि
जिसे
आँच
न
आई,
तू
है
एक
आईना
कि
जो
टूट
चुका
है,
मैं
हूँ
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Fauziya Rabab
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गुदाज़-ए-इश्क़
नहीं
कम
जो
मैं
जवाँ
न
रहा
वही
है
आग
मगर
आग
में
धुआँ
न
रहा
Jigar Moradabadi
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ये
सच
है
नफ़रतों
की
आग
ने
सब
कुछ
जला
डाला
मगर
उम्मीद
की
ठण्डी
हवाएँ
रोज़
आती
हैं
Munawwar Rana
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ये
इश्क़
नहीं
आसाँ
इतना
ही
समझ
लीजे
इक
आग
का
दरिया
है
और
डूब
के
जाना
है
Jigar Moradabadi
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मैं
आ
रहा
हूँ
अभी
चूम
कर
बदन
उस
का
सुना
था
आग
पे
बोसा
रक़म
नहीं
होता
Shanawar Ishaq
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क्या
हुआ
जो
मुझे
हम-उम्र
मोहब्बत
न
मिली
मेरी
ख़्वाहिश
भी
यही
थी
कि
बड़ी
आग
लगे
Muzdum Khan
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जब
कभी
कोई
काम
याद
आया
तब
उन्हें
मेरा
नाम
याद
आया
जब
ये
सोचा
कि
उन
से
थी
पहचान
दूर
ही
का
सलाम
याद
आया
फिर
नशेमन
की
अबतरी
देखी
फिर
क़फ़स
का
निज़ाम
याद
आया
फिर
वो
शब
वो
सुकूत
का
आलम
फिर
ख़ुदा
का
कलाम
याद
आया
आज
उन्हें
देख
कर
मोहब्बत
का
क़िस्सा-ए-ना-तमाम
याद
आया
हाए
माज़ी
के
ख़ैरियत
ना
में
जाने
किस
किस
का
नाम
याद
आया
बन
में
देखा
जो
वहशियों
का
हुजूम
शहर
का
इज़्दिहाम
याद
आया
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धूप
खिड़की
से
सिरहाने
आई
चाँद
ख़्वाबों
के
बुझाने
आई
हाए
वो
फूल
से
हँसते
चेहरे
याद
फिर
उन
की
रुलाने
आई
दिल
चराग़ों
के
अभी
लर्ज़ां
हैं
फिर
हवा
होश
उड़ाने
आई
दिल
सुलगता
था
शब-ए-ग़म
यूँँही
चाँदनी
और
जलाने
आई
उठ
हुई
सुब्ह-ए-अज़ाँ
की
आवाज़
नींद
से
मुझ
को
जगाने
आई
ओढ़
ली
तू
ने
बरहना
तहज़ीब
शर्म
तुझ
को
न
ज़माने
आई
और
'परवीन'
से
हुज्जत
कीजे
आप
की
अक़्ल
ठिकाने
आई
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अब्र-ए-रहमत
घरों
पे
रहते
थे
जब
दुपट्टे
सरों
पे
रहते
थे
वो
भी
पर्दा-दरों
में
शामिल
हैं
पर्दे
जिन
के
दरों
पे
रहते
थे
आज
के
ताजवर
हैं
जो
कल
तक
वक़्त
की
ठोकरों
पे
रहते
थे
उन
की
किरचों
से
पावँ
ज़ख़्मी
हैं
होंट
जो
साग़रों
पे
रहते
थे
रक़्स
करते
थे
हम
भी
लेकिन
हाँ
मरकज़ों
महवरों
पे
रहते
थे
हम
को
रहना
पड़ा
वहाँ
'परवीन'
दिल
जहाँ
ख़ंजरों
पे
रहते
थे
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अब
वो
आँगन
वो
घर
न
खपरेलें
पेड़
पंछी
न
फूल
और
बेलें
ज़िंदगी
हम
तिरे
मुहाफ़िज़
हैं
क्यूँ
न
फिर
अपनी
जान
पर
खेलें
आसमाँ
से
हुमकता
रहता
है
चाँद
को
लाओ
गोद
में
ले
लें
अपने
घर
की
घुटन
ही
बेहतर
है
हिजरतों
का
अज़ाब
क्यूँ
झेलें
वज़्न
पर
हों
ग़ज़ल
के
सब
मिसरे
पीढ़ियों
से
न
उतरीं
ये
रेलें
क्या
जराएम
का
सद्द-ए-बाब
हुआ
और
आबाद
हो
गईं
जेलें
अब
तो
सस्ती
है
शाइ'री
'परवीन'
लगती
रहती
हैं
आए
दिन
सेलें
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हम
ख़ुदा
थे
न
ख़ुदाई
अपनी
क्या
बयाँ
करते
बड़ाई
अपनी
बस
तिरा
ध्यान
मुझे
आया
था
फिर
कभी
याद
न
आई
अपनी
सब
पहुँच
में
हैं
मगर
क्या
कहिए
किस
के
दिल
तक
है
रसाई
अपनी
दिल
में
लाए
तिरे
ख़्वाबों
का
ख़याल
हम
ने
ख़ुद
नींद
उड़ाई
अपनी
तुम
ये
कह
दो
चलो
हम
हार
गए
ख़त्म
की
मैं
ने
लड़ाई
अपनी
कौन
समझेगा
ये
आँसू
हैं
गुहर
क्यूँ
लुटाते
हो
कमाई
अपनी
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