tumhaara zauq-e-parastish mujhe aziz magar | तुम्हारा ज़ौक़-ए-परस्तिश मुझे अज़ीज़ मगर

  - Parveen Fana Syed
तुम्हाराज़ौक़-ए-परस्तिशमुझेअज़ीज़मगर
मैंइसज़मीनकीमिट्टीमुझेख़ुदाकहो
तुम्हारेसाथअगरदो-क़दमभीचलसकूँ
तोख़स्ता-पाहूँमुझेमुजरिम-ए-वफ़ाकहो
येएकपलकीधड़कतीहयातभीहैबहुत
तमाम-उम्रकेइसरोगकोबुराकहो
इसएकख़ौफ़सेलबसीलिएतुम्हारेहुज़ूर
किहर्फ़-ए-शौक़कोइज़हार-ए-मुद्दआकहो
येबे-रुख़ीकागिलामुझसेपहलेख़ुदसेकरो
उसेनिगाहकायक-तरफ़ाफ़ैसलाकहो
गुज़रतेवक़्तकेमरहमसेभरजाएकहीं
इसएकज़ख़्मकोचाहतकीइंतिहाकहो
मैंएकज़िंदाहक़ीक़तहूँएकपलहीसही
तुम्हाराअक्सहूँतुमतोमुझेफ़नाकहो
  - Parveen Fana Syed
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