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Paras Angral
hansne ko to duniya kam pad jaati hai
hansne ko to duniya kam pad jaati hai | हँसने को तो दुनिया कम पड़ जाती है
- Paras Angral
हँसने
को
तो
दुनिया
कम
पड़
जाती
है
रोने
को
इक
कंधा
काफ़ी
होता
है
- Paras Angral
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आज
मैं
जो
घुटनों
पर
हूँ
मेरा
क़द
तुम
सेे
ऊँचा
है
Paras Angral
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बात
करता
हूँ
कभी
आवाज़
देता
हूँ
अपने
ख़्वाबों
को
नई
परवाज़
देता
हूँ
Paras Angral
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न
जाने
उसने
क्या
यहाँ
गँवाया
था
वो
आह
जिसने
ये
मकाँ
जलाया
था
ये
जिस्म
मेरे
साथ
तो
रहा
मगर
जो
छोड़
के
गया
वो
मेरा
साया
था
जो
तुझ
सेे
बिछड़ा
तो
अयाँ
हुआ
मुझे
मुझे
तू
कितना
मेरे
पास
लाया
था
मैं
उस
सेे
पूछता
रहा
पता
मिरा
जिसे
मैं
दर
तक
अपने
लेके
आया
था
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Paras Angral
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मैं
तुम्हें
ही
जानता
हूँ
कुछ
न
गर
मैं
मानता
हूँ
लाख
चेहरों
में
वो
इक
को
दूर
से
पहचानता
हूँ
और
तो
कोई
नहीं
पर
माँ
तुझे
रब
मानता
हूँ
जो
हक़ीक़त
में
नहीं
है
ख़्वाब
में
वो
जानता
हूँ
नाम
बेशक
लूँ
न
उसका
ख़ूनी
को
पहचानता
हूँ
सच
उसे
'पारस'
कहूँगा
दिल
में
तो
ये
ठानता
हूँ
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Paras Angral
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मसअला
दिल
का
कभी
हल
न
हुआ
एक
वो
शे'र
मुकम्मल
न
हुआ
शख़्स
ऐसा
न
अता
करना
ख़ुदा
आज
मेरा
हुआ
पर
कल
न
हुआ
मसअला
गर
जुदा
होने
का
था
बे-वफ़ाई
तो
कोई
हल
न
हुआ
आज़माना
था
तुझे
भी
जहाँ
ने
इस
में
क्या
आज
तू
अव्वल
न
हुआ
उसकी
आँखों
को
था
तकना
पारस
और
ये
काम
मुसलसल
न
हुआ
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Paras Angral
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