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Nivesh sahu
agarche ab bhi junoon-khez dil thama nahin hai
agarche ab bhi junoon-khez dil thama nahin hai | अगरचे अब भी जुनूँ-ख़ेज़ दिल थमा नहीं है
- Nivesh sahu
अगरचे
अब
भी
जुनूँ-ख़ेज़
दिल
थमा
नहीं
है
पर
अब
किसी
से
मोहब्बत
का
सिलसिला
नहीं
है
ज़रा
सी
देर
में
सुख
दुख
नहीं
बदलते
हैं
किसी
से
हाथ
मिलाने
का
फ़ाइदा
नहीं
है
मुझे
ख़बर
है
मेरी
राह
मेरी
अपनी
है
मुझे
पता
है
मेरा
कोई
रहनुमा
नहीं
है
मुझे
यक़ीन
दिलाओ
कि
मेरे
साथ
हो
तुम
मुझे
यक़ीन
दिलाओ
कि
दिल
भरा
नहीं
है
- Nivesh sahu
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बारे
दुनिया
में
रहो
ग़म-ज़दा
या
शाद
रहो
ऐसा
कुछ
कर
के
चलो
याँ
कि
बहुत
याद
रहो
Meer Taqi Meer
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तेरे
जाने
से
ज़्यादा
हैं
न
कम
पहले
थे
हम
को
लाहक़
हैं
वही
अब
भी
जो
ग़म
पहले
थे
Afzal Khan
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जब
भी
आता
है
दिसम्बर
ग़म
के
टाँके
खुलते
हैं
याद
है
यूँँ
तेरा
जाना
और
कहना
ख़ुश
रहो
Neeraj Neer
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अपनी
तबाहियों
का
मुझे
कोई
ग़म
नहीं
तुम
ने
किसी
के
साथ
मोहब्बत
निभा
तो
दी
Sahir Ludhianvi
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ग़म-ए-दुनिया
भी
ग़म-ए-यार
में
शामिल
कर
लो
नश्शा
बढ़ता
है
शराबें
जो
शराबों
में
मिलें
Ahmad Faraz
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ख़ुदा
की
शा'इरी
होती
है
औरत
जिसे
पैरों
तले
रौंदा
गया
है
तुम्हें
दिल
के
चले
जाने
पे
क्या
ग़म
तुम्हारा
कौन
सा
अपना
गया
है
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Ali Zaryoun
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मज़ाक
सहना
नहीं
है
हँसी
नहीं
करनी
उदास
रहने
में
कोई
कमी
नहीं
करनी
Swapnil Tiwari
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अब
क्या
ही
ग़म
मनाएँ
कि
क्या
क्या
हुआ
मियाँ
बर्बाद
होना
ही
था
सो
बर्बाद
हो
गए
shaan manral
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मैं
ज़िंदगी
के
सभी
ग़म
भुलाए
बैठा
हूँ
तुम्हारे
इश्क़
से
कितनी
मुझे
सहूलत
है
Zeeshan Sahil
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अपनी
हालत
का
ख़ुद
एहसास
नहीं
है
मुझ
को
मैं
ने
औरों
से
सुना
है
कि
परेशान
हूँ
मैं
Aasi Uldani
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जाओ
कोई
तारा-वारा
नहीं
गिरता
हम
ही
छत
से
जुगनू
फेंका
करते
थे
Nivesh sahu
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तक़दीर
पे
राज़ी
हूँ
न
तदबीर
से
ख़ुश
हूँ
मैं
ख़्वाब-ज़दा
कब
किसी
ता'बीर
से
ख़ुश
हूँ
कुछ
रोज़
से
चलने
की
रज़ा
ही
नहीं
मुझ
में
कुछ
रोज़
से
मैं
पाँव
की
ज़ंजीर
से
ख़ुश
हूँ
मैं
ख़ुद
को
बनाने
की
जुगत
ही
नहीं
करता
जैसी
भी
है
जो
है
तेरी
तामीर
से
ख़ुश
हूँ
मिलने
के
लिए
ख़ुद
से
निकलना
भी
तो
होगा
ऐ
जान-ए-वफ़ा
मैं
तेरी
तस्वीर
से
ख़ुश
हूँ
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Nivesh sahu
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फ़ितरत
का
बाब-ए-हुस्न
में
ऐसा
भी
सीन
है
जो
जितना
बदमिजाज़
है
उतना
हसीन
है
इक
रौशनी
का
शहर
है
उस
दिलरुबा
का
जिस्म
जिस
में
हमारी
तीरगी
गोशा-नशीन
है
बदनाम
तेरे
ग़म
से
हूँ
और
है
इसी
से
नाम
मेरे
लिए
ये
साँप
मेरी
आस्तीन
है
मेरा
वही
सवाल
है
दो
वक़्त
की
खुराक़
तुझको
कोई
असार
है
कोई
अमीन
है
मेरे
लिए
वो
लफ़्ज़-ए-मुक़द्दस
है
बस
यक़ीन
वो
ही
जो
तेरे
वास्ते
कुछ
दीन-वीन
है
कद्दावरी
ये
दिल
पे
मेरी
जाइएगा
मत
हर
आसमाँ
के
पाँव
तले
इक
ज़मीन
है
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Nivesh sahu
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दरिया
से
इख़्तिलात
है
हम
रो
नहीं
रहे
रोना
हमारी
ज़ात
है
हम
रो
नहीं
रहे
कितने
दिनों
के
बाद
ख़ुशी
से
मिले
हैं
हम
कितनी
अजीब
बात
है
हम
रो
नहीं
रहे
ये
दिन
भी
कोई
दिन
था
जब
ख़ुश-गवार
दिन
ये
रात
कोई
रात
है
हम
रो
नहीं
रहे
रोने
लगे
तो
कौन
हमें
चुप
कराएगा
सो
इसकी
एहतियात
है
हम
रो
नहीं
रहे
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Nivesh sahu
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लड़ी
जो
काम
से
क़िस्मत
तो
ख़ूब
लड़ने
दी
उजड़ने
लग
गई
दुनिया
तो
फिर
उजड़ने
दी
फटा
पुराना
ही
पहना
लिबास
रिश्तों
का
कहीं
से
उधड़ी
सिलाई
तो
बस
उधड़ने
दी
न
अपनी
धूप
बिगाड़ी
किसी
के
साए
में
न
अपने
साए
तले
और
की
बिगड़ने
दी
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Nivesh sahu
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