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Naviii dar b dar
ye duniya chali hi kidhar tak
ye duniya chali hi kidhar tak | ये दुनिया चली ही किधर तक
- Naviii dar b dar
ये
दुनिया
चली
ही
किधर
तक
खड़ी
ही
रही
थी
जिधर
तक
है
शाम-ओ-सहर
एक
से
सब
हुई
बस
उधर
से
इधर
तक
- Naviii dar b dar
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साल
अब
यूँँ
ही
किताबों
जैसे
हैं
पन्ने
दर
पन्ने
बदलते
रहते
हैं
Naviii dar b dar
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वो
मुझ
को
याद
भी
क्या
करता
होगा
अब
ये
हर
दिन
जिस
की
यादों
में
गुज़रता
है
Naviii dar b dar
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हर
शख़्स
की
नीयत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
मैं
बात
की
औसत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
है
आदमी
क्यूँ
आदमी
का
अब
यहाँ
दुश्मन
उस
खोई
'अक़ीदत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
जो
हो
रहा
है
मुल्क
में
ये
नफ़रतों
का
दौर
मैं
दिल
से
भी
अज़्मत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
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Naviii dar b dar
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मुहब्बत
ने
सबको
किनारा
दिया
है
किसी
शख़्स
का
यूँँ
सहारा
दिया
है
जिसे
मानता
है
ये
सारा
ज़माना
मुक़द्दस
ये
रिश्ता
भी
प्यारा
दिया
है
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Naviii dar b dar
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इश्क़
घर
कर
रहा
यूँँ
ही
अंदर
मेरे
ख़्वाब
हैं
भटके
से
अब
यूँँ
दर
दर
मेरे
जबसे
रूठा
है
वो
हर
ख़ुशी
लुट
गई
चाँद
तन्हा
रहा
रात
भर
घर
मेरे
है
समझ
प्यार
की
अब
किसी
को
कहाँ
अब
निकल
आते
हैं
आँसू
डर
कर
मेरे
बात
को
मानकर
जब
भी
बढ़ता
रहा
मंज़िलें
थीं
कहाँ
राह
भर
कर
मेरे
उम्र
भर
अब
यूँँ
तोहमत
लगाएगा
वो
मुस्कुराने
का
इल्ज़ाम
है
सर
मेरे
सारी
दुनिया
को
भी
यूँँ
भुला
दूँगा
मैं
सामने
आए
वो
जो
नज़र
भर
मेरे
अब
तो
घर
द्वार
सब
छोड़
आए
नवी
चार
पैसे
कमाने
हुनर
पर
मेरे
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