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Naviii dar b dar
Har shaksh kii niiyat ko yahan dhundh raha hoon
हर शख़्स की नीयत को यहाँ ढूँढ़ रहा हूँ
- Naviii dar b dar
हर
शख़्स
की
नीयत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
मैं
बात
की
औसत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
है
आदमी
क्यूँ
आदमी
का
अब
यहाँ
दुश्मन
उस
खोई
'अक़ीदत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
जो
हो
रहा
है
मुल्क
में
ये
नफ़रतों
का
दौर
मैं
दिल
से
भी
अज़्मत
को
यहाँ
ढूँढ़
रहा
हूँ
- Naviii dar b dar
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मुहब्बत
हमें
हो
कहाँ
से
भला
हमें
ग़म
है
हासिल
यहाँ
से
भला
ये
हस्ती
ये
बस्ती
भी
तेरी
रही
मुझे
क्या
मिला
इस
जहाँ
से
भला
किसी
की
कहानी
किसी
की
नहीं
मुहब्बत
सिखाऍं
कहाँ
से
भला
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Naviii dar b dar
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वो
अलग
किरदार
में
दिखता
है
अब
आदमी
क्यूँ
हार
में
दिखता
है
अब
देखकर
दुख
होता
है
दिल
को
मेरे
झूठ
हर
अख़बार
में
दिखता
है
अब
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मंज़िलें
यूँँ
भी
तो
हासिल
हैं
ही
वो
सब
मुझको
रास्ता
पर
तुझे
पाने
का
नहीं
है
कोई
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हम
चले
थे
किधर
को
किधर
के
लिए
राह
निकली
नहीं
थी
जिधर
के
लिए
एक
दिल
ही
तो
था
साथ
मेरे
सदा
यूँँ
तमन्ना
लिए
हम
जिधर
के
लिए
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यूँँ
तो
हर
उलझनों
से
उलझा
पड़ा
हूँ
मैं
पर
फिर
भी
ज़िन्दगी
में
डटकर
खड़ा
हूँ
मैं
ग़म
कोई
भी
न
छू
पाए
मेरे
घर
को
यूँँ
ये
ज़िम्मेदारी
से
जो
घर
का
बड़ा
हूँ
मैं
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