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Naviii dar b dar
hai kitna mutmain har dard ko raahat samajhta hai
hai kitna mutmain har dard ko raahat samajhta hai | है कितना मुतमइन हर दर्द को राहत समझता है
- Naviii dar b dar
है
कितना
मुतमइन
हर
दर्द
को
राहत
समझता
है
ये
दिल
पर
जो
मिले
उन
ज़ख़्मों
को
चाहत
समझता
है
- Naviii dar b dar
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वो
भरी
इक
बज़्म
में
दिल
दुखाता
भी
रहा
लहजे
में
रंगत
लिए
मुस्कुराता
भी
रहा
वो
यूँँ
नज़रें
भी
बचाकर
मुझे
बस
देखता
तो
बचाकर
नज़रें
मुझ
सेे
छुपाता
भी
रहा
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जी
रहे
हैं
मुफ़लिसी
में
रास्ता
कोई
नहीं
पैसे
वाले
का
ज़मीं
से
वास्ता
कोई
नहीं
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पाने
को
इक
हसीं
ख़्वाब
का
वो
नगर
बस
भटकता
रहा
यूँँ
नवी
दर-ब-दर
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तो
कभी
ये
ज़मीं
आसमाँ
की
तलब
अब
कहाँ
ख़त्म
होती
जहाँ
की
तलब
बात
कह
के
गुज़ारी
यूँँ
ही
रात
भर
इश्क़
को
भी
कहाँ
अब
गुमाँ
की
तलब
आँख
भी
देखे
जो
और
सिर
ले
झुका
दिल
को
है
ऐसे
ही
रहनुमा
की
तलब
यार
मुझको
कमी
एक
है
खल
रही
ढूँढता
दिल
तो
है
दास्ताँ
की
तलब
वस्ल
और
हिज्र
के
कश्मकश
में
'नवी'
मुझ
को
तो
एक
ऐसे
मकाँ
की
तलब
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दुनिया
बड़ी
ख़राब
ज़रा
देख
भाल
के
मिलते
नहीं
जवाब
यहाँ
हर
सवाल
के
क़िस्मत
में
कोई
मिल
न
सका
हमको
तो
यहाँ
आए
हैं
ज़िन्दगी
में
कई
तो
कमाल
के
हस्ती
भी
अपनी
मिट
गई
तेरे
ही
प्यार
में
हमको
तो
फिर
से
बख़्श
दो
तुम
यूँँ
बहाल
के
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