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Naviii dar b dar
to kabhi ye zameen aasmaañ kii talab
to kabhi ye zameen aasmaañ kii talab | तो कभी ये ज़मीं आसमाँ की तलब
- Naviii dar b dar
तो
कभी
ये
ज़मीं
आसमाँ
की
तलब
अब
कहाँ
ख़त्म
होती
जहाँ
की
तलब
बात
कह
के
गुज़ारी
यूँँ
ही
रात
भर
इश्क़
को
भी
कहाँ
अब
गुमाँ
की
तलब
आँख
भी
देखे
जो
और
सिर
ले
झुका
दिल
को
है
ऐसे
ही
रहनुमा
की
तलब
यार
मुझको
कमी
एक
है
खल
रही
ढूँढता
दिल
तो
है
दास्ताँ
की
तलब
वस्ल
और
हिज्र
के
कश्मकश
में
'नवी'
मुझ
को
तो
एक
ऐसे
मकाँ
की
तलब
- Naviii dar b dar
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कभी
जो
इक
नज़र
मुझ
को
भी
उन
की
दीद
हो
मैं
इस
उम्मीद
से
ख़ुद
को
सँभाले
रक्खा
हूँ
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जीने
को
भी
दर्द
से
कम
नहीं
ये
ज़िन्दगी
आते
हैं
यहाँ
भी
पल
यूँँ
घुटन
भरे
हुए
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कुछ
काम
से
छले
गए
कुछ
नाम
से
छले
गए
जब
राह
भी
मिली
नहीं
आराम
से
छले
गए
किस
आस
में
रहें
भला
बदनाम
से
छले
गए
इक
राह
को
चले
कहाँ
अंजाम
से
छले
गए
जब
इश्क़
को
न
पा
सके
यूँँ
जाम
से
छले
गए
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मेरे
गर्दिश
के
हैं
जो
सितारे
अब
नहीं
हैं
किसी
के
सहारे
पाले
रक्खा
दुखों
का
समुंदर
इक
भी
अरमाँ
नहीं
हैं
हमारे
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पुख़्ता
है
अब
आयाम
भी
उनके
बहकाने
के
लिए
शाम
आवाज़ें
दे
रहे
वो
यूँँ
मय-ख़ाने
के
लिए
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