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Naviii dar b dar
gareebi ne diya hai mujhko jo bhi ye
gareebi ne diya hai mujhko jo bhi ye | गरीबी ने दिया है मुझको जो भी ये
- Naviii dar b dar
गरीबी
ने
दिया
है
मुझको
जो
भी
ये
गरीबों
की
मुझे
फिर
हाए
कैसी
ये
- Naviii dar b dar
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मैं
दिल
के
उन
सवालों
को
भूलूँ
कैसे
वो
बहकाते
ख़यालों
को
भूलूँ
कैसे
मिली
जो
मुद्दतों
से
मंज़िल
वो
हमको
मैं
उन
पाँव
के
छालों
को
भूलूँ
कैसे
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तो
कभी
ये
ज़मीं
आसमाँ
की
तलब
अब
कहाँ
ख़त्म
होती
जहाँ
की
तलब
बात
कह
के
गुज़ारी
यूँँ
ही
रात
भर
इश्क़
को
भी
कहाँ
अब
गुमाँ
की
तलब
आँख
भी
देखे
जो
और
सिर
ले
झुका
दिल
को
है
ऐसे
ही
रहनुमा
की
तलब
यार
मुझको
कमी
एक
है
खल
रही
ढूँढता
दिल
तो
है
दास्ताँ
की
तलब
वस्ल
और
हिज्र
के
कश्मकश
में
'नवी'
मुझ
को
तो
एक
ऐसे
मकाँ
की
तलब
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यूँँ
तो
हर
उलझनों
से
उलझा
पड़ा
हूँ
मैं
पर
फिर
भी
ज़िन्दगी
में
डटकर
खड़ा
हूँ
मैं
ग़म
कोई
भी
न
छू
पाए
मेरे
घर
को
यूँँ
ये
ज़िम्मेदारी
से
जो
घर
का
बड़ा
हूँ
मैं
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रास्ता
ही
नहीं
दिल
में
भी
जाने
को
कितने
ही
ढब
किए
यूँँ
तुझे
पाने
को
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लाज़मी
क्यूँँ
हो
ये
जो
मुझको
ही
हर
ग़म
देना
मेरे
ग़म
में
सदा
मुस्कान
ही
हासिल
होगी
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