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Naviii dar b dar
laazmi kyun ho ye jo mujhko hi har gham dena
laazmi kyun ho ye jo mujhko hi har gham dena | लाज़मी क्यूँँ हो ये जो मुझको ही हर ग़म देना
- Naviii dar b dar
लाज़मी
क्यूँँ
हो
ये
जो
मुझको
ही
हर
ग़म
देना
मेरे
ग़म
में
सदा
मुस्कान
ही
हासिल
होगी
- Naviii dar b dar
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तो
इस
नफ़रत
ने
सब
को
बाँट
के
रख
ही
दिया
लहू
का
क़तरा
भी
अब
तेरा
मेरा
हो
चला
Naviii dar b dar
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यादों
के
भी
सहारे
धरे
रह
गए
दुनिया
में
इश्क़
सारे
धरे
रह
गए
हाथ
तो
थाम
ही
जब
लिया
और
का
थे
जो
क़िस्से
हमारे
धरे
रह
गए
अब
तो
जीना
भी
मुश्किल
यूँँ
लगता
ही
है
बातों
के
वो
किनारे
धरे
रह
गए
अक़्ल
मर
ही
गई
प्यार
में
भी
सनम
सब
मुहब्बत
के
मारे
धरे
रह
गए
कुछ
तो
आँखों
का
जादू
था
उसने
किया
भटके
भूले
वो
प्यारे
धरे
रह
गए
बात
उनकी
रही
ज़िक्र
में
ही
सदा
क़िस्से
सारे
के
सारे
धरे
रह
गए
हो
गए
एक
सारे
ज़माने
में
अब
इक
'नवी'
जो
कुँवारे
धरे
रह
गए
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Naviii dar b dar
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ज़माने
में
है
ये
जो
तनक़ीद
अपनी
भला
कोई
किस
रास्ते
को
चुने
यूँँ
Naviii dar b dar
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हमें
छोड़कर
यूँँ
गर
चले
जाओगे
तुम
कभी
भटकते
रहोगे
तन्हा
ये
उम्मीद
है
हमें
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है
मेरी
ये
जो
शख़्सियत
नाम
के
ही
उलट
यूँँ
मैं
ख़ामोश
सा
रहता
हूँ
और
वो
बेबाक़
सा
भी
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