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Nakul kumar
ajab suroor si chadhi vo aashiqi nayi nayi
ajab suroor si chadhi vo aashiqi nayi nayi | अजब सुरूर सी चढ़ी वो आशिक़ी नई नई
- Nakul kumar
अजब
सुरूर
सी
चढ़ी
वो
आशिक़ी
नई
नई
हमें
लगा
कि
हो
गई
ये
ज़िंदगी
नई
नई
नई
नई
लगी
हवा
नए
लगे
दयार
सब
नशा
नया
हुआ
हमें
थी
बे-ख़ुदी
नई
नई
तमाम
ग़म
जहान
के
मेरे
जिगर
में
आ
बसे
यूँँ
मेरे
दिल
को
मिल
गई
कुशादगी
नई
नई
ये
दिल
की
धड़कनों
का
भी
मुआमला
अजीब
है
कभी
लगी
हैं
आख़िरी
कभी
कभी
नई
नई
- Nakul kumar
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उसी
का
शहर
वही
मुद्दई
वही
मुंसिफ़
हमें
यक़ीं
था
हमारा
क़ुसूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
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ईद
ख़ुशियों
का
दिन
सही
लेकिन
इक
उदासी
भी
साथ
लाती
है
ज़ख़्म
उभरते
हैं
जाने
कब
कब
के
जाने
किस
किस
की
याद
आती
है
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Farhat Ehsaas
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ये
शहर-ए-अजनबी
में
अब
किसे
जा
कर
बताएँ
हम
कहाँ
के
रहने
वाले
हैं
कहाँ
की
याद
आती
है
Ashu Mishra
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अँधेरों
में
भले
ही
साथ
छोड़ा
था
हमारा
मगर
जब
रौशनी
लौटी
तो
साए
लौट
आए
Vikas Sahaj
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प्यार
दो
बार
थोड़ी
होता
है
हो
तो
फिर
प्यार
थोड़ी
होता
है
यही
बेहतर
है
तुम
उसे
रोको
मुझ
सेे
इनकार
थोड़ी
होता
है
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Zubair Ali Tabish
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इश्क़
हुआ
है
क्या
तुझ
को
भी
तेरा
जो
होगा
सो
होगा
shaan manral
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मुझे
शराब
पिलाई
गई
है
आँखों
से
मेरा
नशा
तो
हज़ारों
बरस
में
उतरेगा
Vijendra Singh Parwaaz
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ये
न
थी
हमारी
क़िस्मत
कि
विसाल-ए-यार
होता
अगर
और
जीते
रहते
यही
इंतिज़ार
होता
Mirza Ghalib
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सफ़र
से
लौट
जाना
चाहता
है
परिंदा
आशियाना
चाहता
है
Shakeel Jamali
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कभी
फूल
देखती
है
कभी
देखती
है
कलियाँ
मुझे
कर
रही
है
पागल
ये
नज़र
फिसल
फिसल
के
Ajeetendra Aazi Tamaam
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मुंतज़िर
हूँ
मैं
सहर
का
रौशनी
है
तंग
मेरी
एक
मिट्टी
का
दिया
हूँ
रात
से
हैं
जंग
मेरी
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Nakul kumar
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एक
दिन
बनेंगे
खाक
हम
मिट्टी
की
हैं
खुराक
हम
भीतर
ख़लाए
साथ
है
बाहरस
ठीक-ठाक
हम
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Nakul kumar
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इक
शहज़ादी
ने
दी
है
इक
माँ
को
उतरन
इक
बच्ची
को
मिल
जाएँगे
नए
कपड़े
आज
Nakul kumar
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फिर
नया
ग़म
अगर
यार
देगा
इश्क़
उसका
मुझे
मार
देगा
मेरे
महबूब
का
है
हुनर
ये
ग़म
जो
देगा
मज़ेदार
देगा
राब्ता
तोड़
दूँ
तुम
से
सब
ये
मशवरा
हर
समझदार
देगा
घर
से
बेहतर
न
संसार
है
दोस्त
बस
निराशा
ही
संसार
देगा
आज
का
सच
नज़र
में
छुपा
लो
कल
ख़बर
झूठी
अख़बार
देगा
दुश्मनी
की
लगाना
ये
तस्वीर
नफ़रतो
की
वो
दीवार
देगा
तोड़
दूँ
मैं
अगर
अपना
पिंदार
तब
कहीं
यार
दीदार
देगा
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Nakul kumar
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सबके
चेहरे
पे
ये
पर्दा
क्यूँँ
है
इस
तरह
आदमी
जीता
क्यूँँ
है
ज़िंदगी
मुझको
ये
बतला
दे
तू
कोई
अच्छा
है
तो
तन्हा
क्यूँँ
है
ख्वाहिशें
हैं
जिसे
अपनाए
हुए
वो
हक़ीक़त
में
पराया
क्यूँँ
है
ग़म
परेशान
हो
कर
बोल
उठे
दर्द
सहता
है
तो
हँसता
क्यूँँ
है
डूबता
जाए
है
दिल
अश्कों
में
लेकिन
आँखों
पे
ये
सहरा
क्यूँँ
है
ख़ुद-कुशी
कहती
है
हम
से
पैहम
ऐसे
जीना
है
तो
जीना
क्यूँँ
है
बँट
गया
जिस्म
हवस
में
लेकिन
अब
तक
आँखों
में
वो
चेहरा
क्यूँँ
है
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Nakul kumar
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