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Ameer Qazalbash
usii ka shahar vahii muddai vahii munsif
usii ka shahar vahii muddai vahii munsif | उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
- Ameer Qazalbash
उसी
का
शहर
वही
मुद्दई
वही
मुंसिफ़
हमें
यक़ीं
था
हमारा
क़ुसूर
निकलेगा
- Ameer Qazalbash
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भरोसा
मुझ
पे
रक्खो
और
कुछ
पल
रुका
हूँ,
मैं
अभी
हारा
नहीं
हूँ
Divy Kamaldhwaj
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हर-चंद
ए'तिबार
में
धोके
भी
हैं
मगर
ये
तो
नहीं
किसी
पे
भरोसा
किया
न
जाए
Jaan Nisar Akhtar
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उस
की
ख़्वाहिश
पे
तुम
को
भरोसा
भी
है
उस
के
होने
न
होने
का
झगड़ा
भी
है
लुत्फ़
आया
तुम्हें
गुमरही
ने
कहा
गुमरही
के
लिए
एक
ताज़ा
ग़ज़ल
Irfan Sattar
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यक़ीं
मोहकम
अमल
पैहम
मोहब्बत
फ़ातेह-ए-आलम
जिहाद-ए-ज़िंदगानी
में
हैं
ये
मर्दों
की
शमशीरें
Allama Iqbal
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यक़ीन
कर
वो
तिरे
पास
लौट
आएगा
जब
उस
का
उठने
लगेगा
यक़ीन
लोगों
से
Varun Anand
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तिरा
दिल
मुस्कुराएगा
दु'आ
है
हमें
भी
तो
भरोसा
है
ख़ुदा
पर
Meem Alif Shaz
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भरोसा
तोड़कर
अच्छा
किया
तुमने
मैं
दुनिया
पर
भरोसा
करने
वाला
था
Aatish Alok
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वो
बहुत
चालाक
है
लेकिन
अगर
हिम्मत
करें
पहला
पहला
झूट
है
उस
को
यक़ीं
आ
जाएगा
Zafar Iqbal
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तुम्हारी
ख़ानदानी
रस्म
रस्म-ए-बेवफ़ाई
है
हमीं
पागल
थे
जो
तुम
पर
भरोसा
कर
लिया
हमने
Shajar Abbas
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न
कोई
वा'दा
न
कोई
यक़ीं
न
कोई
उमीद
मगर
हमें
तो
तिरा
इंतिज़ार
करना
था
Firaq Gorakhpuri
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दिल
में
बे-नाम
सी
ख़ुशी
है
अभी
ज़िंदगी
मेरे
काम
की
है
अभी
मैं
भी
तुझ
से
बिछड़
के
सरगर्दां
तेरी
आँखों
में
भी
नमी
है
अभी
दिल
की
सुनसान
रहगुज़ारों
पर
मैं
ने
इक
चीख़
सी
सुनी
है
अभी
मैं
ने
माना
बहुत
अँधेरा
है
फिर
भी
थोड़ी
सी
रौशनी
है
अभी
अपने
आँसू
'अमीर'
क्यूँँ
पोंछूँ
इन
चराग़ों
में
रौशनी
है
अभी
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Ameer Qazalbash
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उसी
का
शहर
वही
मुद्दई
वही
मुंसिफ़
हमें
यक़ीं
था
हमारा
क़ुसूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
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महसूस
कर
रहा
था
उसे
अपने
आस
पास
अपना
ख़याल
ख़ुद
ही
बदलना
पड़ा
मुझे
Ameer Qazalbash
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मिरे
हाल
पर
मेहरबानी
करे
ख़ुदास
कहो
हुक्म-ए-सानी
करे
मैं
इक
बूँद
पानी
बड़ी
चीज़
हूँ
समुंदर
मिरी
पासबानी
करे
पढ़ें
लोग
तहरीर-ए-दीवार
ओ
दर
ख़ुलासा
मिरी
बे-ज़बानी
करे
अज़ल
से
मैं
उस
के
तआक़ुब
में
हूँ
जो
लम्हा
मुझे
ग़ैर-फ़ानी
करे
वो
बख़्शे
उजाले
किसी
सुब्ह
को
कोई
शाम
रौशन
सुहानी
करे
मिरे
साए
में
सब
हैं
मेरे
सिवा
कोई
तो
मिरी
साएबानी
करे
कोई
है
जो
बढ़
के
उठा
ले
'अमीर'
वो
तेशा
जो
पत्थर
को
पानी
करे
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Ameer Qazalbash
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अगर
मस्जिद
से
वाइज़
आ
रहे
हैं
क़दम
क्यूँँ
डगमगाए
जा
रहे
हैं
किसी
की
बे-वफ़ाई
का
गिला
था
न
जाने
आप
क्यूँँ
शरमा
रहे
हैं
ये
दीवाना
किसी
की
क्या
सुनेगा
ये
दीवाने
किसे
समझा
रहे
हैं
मनाने
के
लिए
जश्न-ए-बहाराँ
नशेमन
भी
जलाए
जा
रहे
हैं
'अमीर'
उन
को
है
फ़िक्र-ए-चश्म-ए-नम
भी
वो
दामन
भी
बचाए
जा
रहे
हैं
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Ameer Qazalbash
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